Wednesday, September 22, 2021
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Homeसंवादउज्जवला योजना : हकीकत या फसाना

उज्जवला योजना : हकीकत या फसाना

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मार्च 2015 में हमारे प्रधानमंत्री ने देशवासियों से घरेलु गैस उपभोक्ताओं से गैस सब्सिडी छोड़ने का आह्वान किया था। सरकार द्वारा उस समय यही बताया गया था कि जनता द्वारा स्वेच्छा से सब्सिडी त्यागने के बाद जो धनराशि जुटाई जाएगी उससे उन गरीबों को मुफ़्त गैस कनेक्शन दिया जाएगा जो अभी तक लकड़ी या गोबर के उपले आदि जलाकर चूल्हे पर खाना बनाने के लिए मजबूर हैं। इसी महत्वाकांक्षी योजना का नाम था प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, जिसकी शुरुआत 2016 में जोरदार आयोजनों व जबरदस्त प्रचार प्रसार के साथ एक उत्सव के रूप में हुई थी। जितने पैसे गरीबों को गैस कनेक्शन व गैस चूल्हा आदि मुफ़्त में उपलब्ध करवाने में सरकार ने खर्च किए होंगे संभवत: कमोबेश उतने ही पैसे इन योजना का ढिंढोरा पीटने में खर्च कर दिए गए। इस योजना के अंतर्गत देश के 5 करोड़ लोगों तक गैस कनेक्शन नि:शुल्क पहुंचाना था। विशेषकर गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाली महिलाओं के लिए चलाई जाने वाली इस योजना के पूरा होने की समय सीमा 2019 तय की गई थी।

अभी यह योजना अपने लक्ष्य यानी पांच करोड़ गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों तक पहुंच भी नहीं सकी थी कि इसी बीच वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2021 को आम बजट पेश करते हुए यह घोषणा कर डाली कि प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत इसी वर्ष एक करोड़ रसोई गैस के कनेक्शन मुफ़्त में दिए जाएंगे।

और इसी ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के दूसरे चरण यानी प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना 2:0 की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 10 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में लाभार्थियों को गैस कनेक्शन देते हुए की गई। इस अवसर पर प्रधाननमंत्री ने उज्ज्वला योजना के कुछ लाभार्थियों से भी बात की। यहां गौरतलब यह भी है कि उज्ज्वला योजना 1 :0 में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार की 5 करोड़ महिलाओं को गैस कनेक्शन बांटने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

जबकि 2018 में इसी योजना में सात और श्रेणी की महिलाओं को भी लाभार्थियों की सूची में शामिल किया गया इनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अंत्योदय अन्न योजना, अति पिछड़ा वर्ग, चाय बागान वर्कर, वनवासी व द्वीपों में रहने वाले परिवारों की महिलाएं शामिल हैं।

इसी प्रकार उज्ज्वला 2:0 का लाभ लेने के लिए राशन कार्ड और पता प्रमाणपत्र जमा करने की जरूरत को समाप्त किया गया। नई योजना में जरूरतमंद परिवार स्वयं द्वारा सत्यापित आवेदन देकर भी इस योजना का लाभ ले सकेगा। सरकार द्वारा बताया गया कि यह कनेक्शन कम आमदनी वाले उन परिवारों को दिए जाएंगे, जो उज्ज्वला योजना के पहले चरण में शामिल नहीं हो सके थे।

उज्ज्वला योजना के ‘सरकारी गुणगान अभियान’ के तहत जब हम यह सुनते हैं कि इस योजना से महिलाओं को धुएं से निजात मिलेगी, ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को खाना बनाने के लिए रोजाना प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने के चलते उन्हें जिन समस्याओं से जूझना पड़ता था उससे मुक्ति मिलेगी आदि, तो निश्चित तौर पर ऐसा ही प्रतीत होता है गोया देश के गरीबों की इससे ज्यादा हितचिंतक सरकार दूसरी नहीं हो सकती।

परंतु इस योजना की धरातलीय स्थिति भी क्या वही है जो हमें सरकार व उसकी ‘प्रवक्ता’ बनी बैठी सत्ता परस्त मीडिया द्वारा दिखाई जा रही है? परंतु इस योजना की हकीकत तो कुछ और ही है। और इस हकीकत को जानने के लिए देश के किसी भी गांव या शहर के बीपीएल परिवार के व्यक्ति से मिलकर इस योजना की सफलता या असफलता के निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।

जिस समय 2016 में उज्ज्वला 1.0 शुरू की गई थी, उस समय यानी 2016-17 के दौरान घरेलू गैस की कीमत 550 रुपए प्रति सिलिंडर से भी नीचे थी। उसी समय ऐसे उपभोक्ता सामने आने लगे थे, जिन्होंने आर्थिक तंगी के चलते दुबारा गैस नहीं भरवाई।

और वे पुन: धुआं युक्त पारंपरिक प्रकृतिक ईधन इस्तेमाल करने लगे। सोचने का विषय है कि आज भले ही उज्ज्वला 2. 0 की घोषणा कर उसी पुरानी योजना के नाम पर पुन: वाहवाही लूटने की कोशिश की जा रही हो, परंतु आज उसी गैस का मूल्य लगभग 1000 रुपये प्रति सिलिंडर पहुंचने के करीब है। हर महीने और कभी तो हर हफ़्ते कीमतों में इजाफा जारी है।

सवाल यह है कि जो गरीब 550 रुपये कीमत का सिलिंडर भरने में असमर्थ था, वह भला 1000 रुपये कीमत का सिलिंडर कैसे भरवा सकेगा? और वह भी कोरोना का भयानक संकट झेल चुके उस देश में जहां करोड़ों लोग बेरोजगार हो चुके हों? इस बेरोजगारी का भी सबसे अधिक प्रभाव भी इन्हीं गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों पर ही पड़ा हो? द सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) द्वारा जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि गत वर्ष लॉकडाउन के बाद बेरोजगारी दर बढ़कर 8.35 फीसदी थी।

यदि आज हम किसी भी राज्य की गरीब गृहणियों से मुलाकात करें तो यही पाएंगे कि गैस की कीमत बेतहाशा बढ़ने के चलते अधिकांश गरीबों ने गैस भरवाना बंद कर दिया है। सरकारी उज्ज्वला योजना के अंतर्गत आवंटित सिलिंडर चूल्हे इनके घरों में धूल खा रहे हैं।

किसी ने कई महीनों से गैस नहीं भरवाई तो किसी ने साल दो साल से गैस नहीं ली। ऐसे में इस योजना की सार्थकता पर सवाल उठना लाजिमी है। जब बेरोजगारी व गैस की कीमतें दोनों ही आसमान छू रही हों ऐसे में सहज ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि उज्ज्वला योजना की कितनी हकीकत है और इसका कितना फसाना बयान किया जा रहा है।


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