Sunday, April 26, 2026
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दिल्ली के मर्ज की दवा क्या है?

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दिल्ली के मर्ज की दवा क्या है? 2

इसे स्वास्थ्य का आपातकाल कहा जा सकता है, 13 दिसंबर को ग्रेप -4 लागू हो गया अर्थात अभी तक सांसों में जहर भरने के जो संभावित कारण कहे जाते थे, सभी पर सख्ती से पाबंदी, उसके बावजूद 31 दिसंबर की सुबह दिल्ली एनसीआर में की जगह वायु गुणवत्ता सूचकांक 400 से पार था। जाहिर है कि या तो हम वायु प्रदूषण के असली कारणों का आकलन नहीं कर पा रहे या फिर ऐसे कड़े कदम उठाने से बच रहे हैं जिससे हालात सुधारे जा सकें। बारीकी से देखें तो साफ होता है कि हमारा सारा ध्यान बढ़ गए प्रदूषण को कम करने में अधिक है जबकि सारे तंत्र को प्रदूषण कम हो, इसके लिए काम करना होगा। दुर्भाग्य है कि सरकारी प्रक्रिया, ऊपर से नल खोल कर नीचे पोंछा लगा कर फर्श सुखाने की कवायद से अधिक नहीं है।

लगता है सब रस्म अदायगी है, दीवाली के साथ ही अदालत डांटने लगती है, सरकार विज्ञापन देने लगती है और अस्पतालों में बीमारों की भीड़ बढ़ जाती है। आंकड़ों कि बौछार होती है कि जहरीली हवा किस तरह सांस, दिल, हड्डी से ले कर मानसिक रोग तक का कारण बन रही है। हालांकि दिल्ली समग्र राजधानी क्षेत्र में बरसात के कुछ दिनों को छोड़ कर पूरे साल ही हवा में इतना जहर होता है कि न केवल इंसान की आयु रेखा छोटी होती है, बल्कि ढेर सारी बीमारियों के फेर में उसकी जेब में भी छेद होता है। दिल्ली वायु प्रदूषण से निबटने के असफल प्रयोगों का स्मारक बन कर रह गई है। जैसे -जैसे इलाज तलाशते हैं, मर्ज गहराता जाता है। समझ लें जब कोई कंटक ‘सुरसा मुख’ सा विशाल बन कर रास्ता रोके तो हनुमान को लघु रूप में ही उसका संहार करना होता है। सरकार बड़ी-बड़ी रिपोर्ट, वैज्ञानिक और मशीनों में हवा साफ करने का निदान तलाश रही है जबकि असल में इससे पार पाने के लिए महज सशक्त इच्छा शक्ति ही चाहिए।

जिस दिन यह बात समझ आ जाएगी कि दिल्ली एनसीआर को गैस चैम्बर में तब्दील होने का सबसे बड़ा कारण सड़कों पर राज करते वाहन हैं और इसके पीछे यहां बढ़ती आबादी या दूरस्थ अंचलों से दिल्ली की तरफ हो रहे तेजी से पलायन है, समस्या के निदान का रास्ता खुल जाएगा। हम एक तरफ दिल्ली एनसीआर का विस्तार करते जा रहे हैं, दूसरा यहां नए-नए दफ्तर, उद्योग के लिए रास्ते खोल रहे हैं, तीसरा बगैर मूलभूत सुविधा के सस्ते श्रम और मजबूरी के परिवहन के बस्तियां बढ़ा रहे हैं। फिर सड़कों पर वाहनों की बेतहाशा संख्या से जाम लगता है तो उत्सर्जित जहर और गहरा होता जाता है।

कोई दो दशक पहले दिल्ली को काले धुएं से निजात दिलवाने के लिए जिस सीएनजी को राम-बाण के रूप में स्थापित किया गया था, अब वही र्इंधन से उपजी नाइट्रोजन आॅक्साइड सबसे अधिक प्रदूषण का कारक है। दिल्ली में कुल नाइट्रोजन आॅक्साइड प्रदूषण का लगभग 81 प्रतिशत हिस्सा अकेले परिवहन क्षेत्र (वाहनों) से आता है। फिर सड़कों पर सम-विषम वाहन का प्रयोग हुआ। समर्थ लोगों ने दो-तीन गाड़ियां खरीद कर घर के बाहर जमा कर लीं। फिर वैज्ञानिकों ने भी बताया दिया कि इसका कोई लाभ हुआ नहीं। अगला साल था स्माग टॉवर के नाम। करोड़ों खर्च हुए, उसके 57 करोड़ के विज्ञापन छप गए, लेकिन कुछ ही महीनों में वे बेअसर कबाड़ बन गए। लाख मना करने के बावजूद दिल्ली पर नकली बरसात के प्रयोग पर खर्च किया गया। इस साल चुनिंदा सड़कों पर बिजली के खंभों पर पानी के फव्वारे लगा दिए गए। उनके संचालन की लागत का कोई हिसाब नहीं, लेकिन आंकड़े बानगी हैं कि जहर होती हवा पर इसका कोई खास असर नहीं है। अब वैज्ञानिकों के कमेटियां बन रही हैं, लेकिन समझना होगा कि वैज्ञानिक बढ़ रहे जहर से निजात के सुझाव दे सकते हैं, जबकि वास्तविक समस्या जहर बनने से रोकना या कम करना है।

आखिर इतने प्रयोग असफल क्यों होते हैं? इसे समझना कोई जटिल विज्ञान नहीं हैं। दिल्ली के सर्वाधिक जहरीले इलाके में से एक आनंद विहार रेलवे स्टेशन के सामने देखें-दिलशाद गार्डन की तरफ से कोई दो किलोमीटर लंबे फ्लाई ओवर से जब तेजी से आता टैफिक, चार लेन की इस सड़क पर आता है तो उनके लिए महज एक लेन बकाया रहती है। पटरी बाजार, तिपहिया और बैटरी रिक्शा और फिर बसें सड़क पर ही डेरा डाले रहते हैं। फिर वहां एक वाहन पानी छिड़ता रहता है और वह यदि इस बची एक लेन में आ गया तो सारा यातायात ठप्प। समझ लें यह सब हर दिन के हजारों-लाखों की अवैध वसूली का परिणाम हैं कि यहां उपज रहे जहर के कारकों पर कोई हाथ नहीं डालता। दिल्ली के लगभग सभी मेट्रो स्टेशन के बाहर लगभग यही स्थिति रहती है।

दिल्ली में तो फिर भी कुछ कड़ाई है, लेकिन दिल्ली की सीमा से शून्य किलोमीटर दूर ज्ञानी बॉर्डर कहलाने वाली जीटी रोड पर सारे दिन कोई दस हजार ट्रकों के चलते पूरा आसमान धूल के गुबार से ढका रहता है। एम्स के आगे अरविंदो मार्ग पर गौतम नगर से ग्रीन पार्क तक सड़क पर ही अधिकृत पार्किंग की फीस वसूली जाती है, भले ही वाहनों के चलने के लिए सड़क बचे नहीं। रिंग रोड पर भीकाजी काम प्लेस से सफदरजंग अस्पताल तक फ्लाई ओवर खत्म होते ही बस स्टैंड पूरे दिन जाम उपजाता है। वसंत कुंज में दो किलोमीटर के दायरे में कोई 45 स्कूल हैं, जहां बच्चे 300 से अधिक बसों और उससे दुगनी वैन और उससे तिगुनी निजी गाड़ियों से आते हैं। इन सभी स्कूल्स के खुलने और बंद होने का समय लगभग एक है। सो सुबह और दिन में कई- कई घंटे यहां यातायात की आपाधापी आम बात है। ये थोड़े से उदाहरण हैं। गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद या गुरुग्राम में तो और बदतर हाल हैं।

इस बार दिल्ली सरकार ने कार्यालयों के खुलने-बंद होने के समय में बदलाव का प्रयोग तो किया, लेकिन उसका वांछित प्रभाव दिखा नहीं। यदि गुरुग्राम में नौकरी करने वाला कोई कर्मचारी गाजियाबाद से सफर करता है तो महज आधे घंटे के समय-अंतराल का सड़क पर असर होना नहीं है। काश कर्मचारियों को कार्य स्थल के पास रहने, विद्यालयों में प्रवेश हेतु बच्चे के घर से पांच किलोमीटर का दायरा तय करने, केंद्र सरकार और निजी कंपनियों के ऐसे कार्यालयों को 400 किलोमीटर दूर नए उभर रहे शहरों में भेज दिया जाए, जिनका मंत्रालय से रोज कोई काम नहीं पड़ता तो बड़ी संख्या में भीड़ कम की जा सकती है।

एक बात और जान लें , बीएस -6 के वाहन यदि 45 किमी प्रति घंटा से कम गति पर चलते हैं तो उनसे अधिक प्रदूषण उत्सर्जित होता है। फिर वहां बैटरी का हो या फिर सीएनजी का-उसके टायर के घिसने से उपजने वाले रबर के माइक्रो कण और बैटरी से निकलने वाला तेजाबी धुआं तो आपकी सांस में जाता ही है। अब यह सरकार को तय करना है कि उसे रियल एस्टेट मार्केट को हवा देनी है या अर्बन स्लम बनने से बचना है, नए वाहन खरीदने के सहज कर्जे को पुचकारना है या वाहनों से निकले धुएं से बीमार हो रहे लोगों के इलाज का खर्च कम करना है?

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