Friday, July 19, 2024
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चिड़ियाघरों में दम तोड़ते वन्य जीव

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Nazariya


ALI KHANयह कहा जाता रहा है कि जंगल की तुलना में चिड़ियाघर में वन्यजीवों की औसत आयु चार से पांच वर्ष बढ़ जाती है। इसके पीछे की वजह चिड़ियाघरों में जानवरों की उचित देखरेख, बेहतर भोजन व वातावरण को माना जाता है। लेकिन मौजूदा समय में दिल्ली चिड़ियाघर वन्यजीवों के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है। दिल्ली चिड़ियाघर में बीते वर्षों में अलग-अलग कारणों से 550 से अधिक वन्य-जीवों की मौत हुई है। इसमें छोटे वन्यजीव की प्रजाति से लेकर बड़े वन्य-जीवों की प्रजातियां शामिल हैं। बता दें कि यह जानकारी सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के तहत चिड़ियाघर से मिली है।
जैसा कि इस वर्ष फरवरी में वन्य-जीवों की मौत के संबंध में सूचना मांगी गई थी। जानकारी के मुताबिक, दिल्ली चिड़ियाघर में 2017-18 को छोड़कर बाकी सभी वर्षों में 100 से अधिक वन्य-जीवों की मौत हर वर्ष दर्ज की गई है। इसमें 2017 में एक अप्रैल से लेकर 31 मार्च 2018 के बीच चिड़ियाघर में 75 वन्य-जीवों की मौत हुई। साल 2018-19 में सर्वाधिक संख्या में वन्य-जीवों की मौत दर्ज की गई।

उल्लेखनीय है कि एक अप्रैल 2018 से लेकर सात जून 2019 तक के बीच सबसे अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। इस अवधि में चिड़ियाघर में 245 से अधिक वन्य-जीवों ने दम तोड़ा। आठ जून 2019 से लेकर 31 मार्च 2020 तक के बीच में वन्य-जीवों की मौत घटकर 115 रह गई। जानकारों का कहना है कि दिल्ली चिड़ियाघर में वन्य जीवों की मौत के मामले देश के किसी भी चिड़ियाघर से अधिक हैं। दरअसल, देशभर के चिड़ियाघरों को तीन श्रेणी में बांटा जा सकता है, जिनमें बड़े, मध्यम और मिनी चिड़ियाघर शामिल हैं। दिल्ली चिड़ियाघर, नंदनकानन चिड़ियाघर भुवनेश्वर, चेन्नई चिड़ियाघर, बेन्नारगट्टा बायोलॉजिकल पार्क बेंगलूरु और असम चिड़ियाघर बड़े चिड़ियाघरों की श्रेणी में आते हैं, जबकि कलकत्ता और जयपुर चिड़ियाघर मध्यम श्रेणी में आते हैं। लेकिन देश के सबसे बड़े चिड़ियाघरों में शुमार दिल्ली चिड़ियाघर में वन्य-जीवों की मौत के हर वर्ष बढ़ते आंकड़े चिंता का सबब बनते जा रहे हैं।

इस बीच आम-आदमी के मस्तिष्क में इस सवाल का कौंधना स्वाभाविक है कि आखिर चिड़ियाघर में वन्य-जीव दम क्यों तोड़ रहे हैं? दरअसल, वन्य-जीवों की मौत के कारणों में निमोनिया होने, सदमा या दहशत में होने, टीबी, किडनी के काम न करने, आंत्रशोध रोग, दर्दनाक आघात, फुफ्फुस रोग, सिरोसिस, बुढ़ापा, अंगों का काम न करना, कार्डियक शॉक सहित कई दूसरे कारण आरटीआई में बताए गए हैं। वहीं पर, वर्ष 2020-21 वन्य-जीवों को लेकर जारी हुई रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 30 से अधिक वन्य-जीवों की मौत आघात, दहशत या चोट से हुई। इसमें नीलगाय, सिल्वर फीजेंट कृष्णमृग या काला हिरण सहित कई दूसरे वन्यजीव शामिल हैं। जबकि चीतल की मौत का कारण तनाव और सदमा बताया गया है। इसके अलावा, सफेद शेर की मौत गुर्दों के काम न करने की वजह से हुई है। यह भी देखा गया है कि मौसम में बदलाव के चलते वन्य-जीवों की मौतें हो रही हैं।

पिछले कुछ सालों में दिल्ली चिड़ियाघर में तापमान में बदलाव से सबसे अधिक मौतें हुईं। दरअसल, तापमान में बदलाव की वजह से जानवर सबसे अधिक निमोनिया का शिकार होते हैं। वे गर्मी में बारिश होने पर और तापमान में बदलाव से निमोनिया की चपेट में आ जाते हैं। लिहाजा, मौसम के हिसाब से वन्यजीवों की जीवनशैली में बदलाव का किया जाना आवश्यक है। इस कड़ी में खाने में बदलाव किया जा सकता है। सर्दी में मांसाहारी वन्यजीवों को अधिक मांस देने के साथ उनके लिए हीटर की व्यवस्था की जानी चाहिए। वहीं शाकाहारी वन्यजीवों को गुड़, खिचड़ी, केले, टमाटर, पालक समेत अन्य हरी सब्जियां दी जा सकती हैं।

इसके अलावा, वन्यजीवों की बढ़ी मृत्युदर के पीछे पिछले वर्ष चिड़ियाघर में फैले रेबीज और बर्ड फ्लू प्रमुख कारण हैं। वन्य जीवों की एक चिड़ियाघर से दूसरे चिड़ियाघर में अदला बदली न होना भी एक अहम कारण है। इससे वन्य जीवों में प्रजनन की समस्या गहरा रही है। हिरण प्रजाति के जानवरों में यह समस्या काफी गंभीर है। वहीं, इस समय चिड़ियाघर में कर्मचारियों के आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं, जिससे वन्य जीवों की देखभाल भी प्रभावित हो रही है। दरअसल, वन्यजीवों को ताजा और संतुलित भोजन दिया जाना जरूरी होता है। उनकी निरंतर निगरानी भी सुनिश्चित करनी होती है। हर 15वें दिन पर जानवरों का स्वास्थ्य परीक्षण होता है। बीमार होने पर समय पर उपचार मिलना भी जरूरी होता है। चिड़ियाघर में आवश्यक कार्मिक के अभाव में जानवरों की उचित देखरेख, बेहतर भोजन व वातावरण मुहैया करवाया जाना संभव नहीं है। लिहाजा, चिड़ियाघरों में कर्मचारियों की रिक्तियों को भरने की दिशा में काम किया जाए। इसके अभाव में वन्य जीवों की मौतों के आंकड़ों पर अंकुश लगाना? बेहद मुश्किल है।


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