Friday, December 12, 2025
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डिजिटल हमलों से डरतीं महिलाएं

शारीरिक और यौन हिंसा से अक्सर निपटने वाली महिलाओं के सामने ‘डिजिटल हिंसा’ के रूप में अब एक नया ‘जानवर’ खड़ा हो गया है। विडंबना यह है कि आमतौर पर अदृश्य इस जानवर से निपटने के लिए कोई प्रभावी हथियार भी फिलहाल मौजूद नहीं हैं। ऐसे में क्या करें, महिलाएं? मीडिया को डिजिटल हिंसा से जुड़े मुद्दों पर जागरूकता बढ़ानी होगी। अब समय आ गया है, जब स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल नैतिकता और आॅनलाइन सुरक्षा पर आधारित पाठ्यक्रम जोड़ने चाहिए। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि डिजिटल युग में हिंसा का चेहरा बदल गया है, लेकिन उसका असर उतना ही गहरा है। डिजिटल हिंसा की शिकार हुई महिलाओं से इस बारे में पूछा जाए तो इसका पता चल सकता है।

अमरपाल सिंह वर्मा

दुनिया भर में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ डिजिटल साधनों का दुरुपयोग एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। आज डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके महिलाओं को बदनाम करने, परेशान करने और ब्लैकमेल करने की घटनाएं आम होती जा रही हैं। इस समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (यूएनओ) ने इस वर्ष 25 नवंबर से 10 दिसंबर तक के 16 दिवसीय सक्रियता अभियान की थीम ही महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध डिजिटल हिंसा को समाप्त करने पर केंद्रित की है। इस अभियान का उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ डिजिटल हिंसा को समाप्त करने के लिए वातावरण तैयार करना है।

‘यूएनओ’ के अनुसार महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा हर तीन में से एक महिला को प्रभावित करती है। यह एक वैश्विक मानवाधिकार आपातकाल है जिसे रोका जाना चाहिए। दुर्व्यवहार के सबसे तेजी से बढ़ते रूपों में महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध डिजिटल हिंसा प्रमुख है। भारत में जितनी तेजी से डिजिटल क्रांति हुई है, उतनी तेजी से कोई क्रांति नहीं हुई। डिजिटल क्रांति ने मोबाइल फोन और इंटरनेट को आम लोगों तक पहुंचा दिया है। इसकी बदौलत आम जनता में जागरूकता और सशक्तिकरण जहां सकारात्मक पक्ष है, वहीं इसकी वजह से महिलाओं के खिलाफ हिंसा का एक नया रूप भी उभर कर सामने आया है। इसे ही ‘डिजिटल हिंसा’ नाम मिला है। यह वही हिंसा है जिसका सामना महिलाएं और लड़कियां सालों से वास्तविक दुनिया में करती रही हैं, पर डिजिटल युग में अब उसका रूप और माध्यम बदल गया है।

‘यूएनओ’ के अनुसार किसी व्यक्ति या समूह द्वारा की गई वह हिंसा, जिसकी जड़ें लैंगिक असमानता या भेदभाव में हों और जिसमें डिजिटल या संचार तकनीक का इस्तेमाल किया गया हो, उसे डिजिटल लिंग आधारित हिंसा कहा जाता है। ‘यूएनओ’ के ‘जनसंख्या कोष’ (यूएनएफपीए) के मुताबिक डिजिटल हिंसा महिलाओं और लड़कियों के लिए सामाजिक बदनामी का कारण बनती है। इस वजह से एक ओर उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, वहीं इस कारण वे आफलाइन और आनलाइन संसार में अलग-थलग पड जाती हैं। इसका परिणाम शैक्षणिक संस्थानों और नेतृत्व की भूमिकाओं में उनकी भागीदारी प्रभावित होने के रूप में भी निकल रहा है।

महिलाओं के विरुद्ध ‘डिजिटल हिंसा आॅनलाइन हैरॉसमेंट,’ ‘हेट स्पीच,’ तस्वीरों से छेड़छाड़, ब्लैकमेल, भद्दे संदेश भेजने और अवांछित कॉल जैसे कई रूपों में सामने आ रही है। ‘आटीर्फीशियल इंटेलीजेंस’ (एआई) के दौर में फर्जी वीडियो, ‘डीपफेक’ और एडिटेड कंटेंट तैयार करना पल भर का काम हो गया है। ऐसे में महिलाओं के लिए समस्या और भी बढ़ गई है।
महिलाएं किस कदर डिजिटल हिंसा को झेल रही हैं, इसका अनुमान ‘द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ के एक सर्वे से लगाया जा सकता है। इसके मुताबिक दुनिया में 85 प्रतिशत महिलाओं को किसी-न-किसी रूप में आॅनलाइन हिंसा का सामना करना पड़ा है। भारत में स्थिति चिंताजनक है। ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ (एनसीआरबी) के मुताबिक कोरोना महामारी के बाद महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराधों के मामले तेजी से बढे हैं जिनमें ब्लैकमेलिंग, बदनाम करना, तस्वीरों से छेड़छाड़, अभद्र सामग्री भेजना और फेक प्रोफाइल बनाना जैसी घटनाएं प्रमुख हैं।

महिलाओं और लड़कियों का पीछा करने, उन्हें परेशान करने और उनके साथ दुर्व्यवहार करने के लिए डिजिटल उपकरणों का उपयोग बढ़ रहा है। आज महिलाएं डिजिटल दुर्व्यवहार के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। कब कोई किसी महिला की अंतरंग तस्वीरों को बिना उसकी अनुमति के सोशल मीडिया पर डाल दे या कब कोई व्यक्ति किसी महिला की फर्जी या डिजिटल रूप से हेरफेर की गई न्यूड तस्वीर अथवा वीडियो बनाकर सार्वजनिक कर दे, कौन जानता है। इसके बाद ब्लैकमेलिंग, धमकाने और यौन उत्पीड़न का सिलसिला भी अब कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं रह गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अभद्र भाषा और भद्दे कमेंट्स अब रोजमर्रा की बात हो गई है। ये घटनाएं केवल आॅनलाइन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि कई बार यही मानसिक और सामाजिक हिंसा, वास्तविक जीवन में शारीरिक शोषण और हत्या तक का कारण बन जाती है।

बड़ा सवाल है कि आखिर डिजिटल हिंसा क्यों बढ़ रही है? डिजिटल हिंसा का एक बड़ा कारण टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म के लिए कमजोर नियम और कानूनी ढांचे की अपर्याप्तता है। अधिकांश देशों में अब तक डिजिटल हिंसा को अलग अपराध के रूप में कानूनी मान्यता नहीं दी गई है। भारत में भी कानून तो हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन किए जाने की जरूरत है। समस्या की एक बड़ी वजह सोशल नेटवर्किंग साइटों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जवाबदेही का अभाव भी है। ये प्लेटफॉर्म अक्सर महिलाओं के उत्पीड? या निजी डाटा के दुरुपयोग पर समय पर कार्रवाई नहीं करते। ऐसे मामलों में रिपोर्टिंग प्रक्रिया जटिल है और कई बार पीड़ित महिलाओं को उल्टा शर्मिंदगी और समाज के संदेह का सामना करना पड़ता है।

साइबर विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल दुर्व्यवहार को रोकना मुश्किल इसलिए है क्योंकि अपराधी अदृश्य, गुमनाम और तकनीकी रूप से सक्षम होते हैं। वे नकली पहचान, वीपीएन या फर्जी अकाउंट्स का इस्तेमाल करते हैं जिससे उनकी पहचान छिपी रहती है। साथ ही, सोशल मीडिया का तेज प्रसार, डाटा का निजीकरण न होना और डिजिटल साक्षरता की कमी भी इस समस्या को और बढ़ा रही है। हमारे यहां ज्यादातर महिलाओं को यह भी नहीं पता होता कि उनके पास क्या कानूनी अधिकार हैं और वह ऐसे मामलों मे शिकायत कैसे दर्ज कराएं।

सवाल यह उठता है कि इस समस्या का समाधान कैसे किया जा सकता है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि डिजिटल हिंसा को समाप्त करना किसी एक संस्था या सरकार का नहीं, बल्कि साझा प्रयासों का काम है। साइबर अपराधों की रोकथाम के लिए सरकार को सख्त और स्पष्ट कानून बनाने होंगे। पुलिस और न्याय व्यवस्था में डिजिटल अपराधों की जांच के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता है। टेक्नोलॉजी कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

‘एआई’ के दौर मे ‘डीपफेक,’ फेक प्रोफाइल और आॅनलाइन ट्रोलिंग के खिलाफ स्वचालित सुरक्षा तंत्र विकसित किए बिना समाधान की ओर नहीं बढ़ा जा सकता। समाज को भी रवैया बदलना होगा। पूर्वाग्रह के चलते ऐसे मामलों में महिलाओं को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है, जबकि जरूरत इस बात की है कि पीड़ित महिलाओं को दोष देने के बजाय उनकी मदद की जाए।

मीडिया को डिजिटल हिंसा से जुड़े मुद्दों पर जागरूकता बढ़ानी होगी। अब समय आ गया है, जब स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल नैतिकता और आॅनलाइन सुरक्षा पर आधारित पाठ्यक्रम जोड़ने चाहिए। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि डिजिटल युग में हिंसा का चेहरा बदल गया है, लेकिन उसका असर उतना ही गहरा है। डिजिटल हिंसा की शिकार हुई महिलाओं से इस बारे में पूछा जाए तो इसका पता चल सकता है।

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