Sunday, May 24, 2026
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अमेरिका में 70 फीसद लोग आयुर्वेदिक दवाओं की ओर उन्मुख: प्रो. तोमर

  • कोरोना संकट में बढ़ी आयुर्वेद की मांग, दुनिया ने माना लोहा
  • गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आयुर्वेद कॉलेज) में दीक्षा पाठ्यचर्या समारोह का चौथा दिन

जनवाणी ब्यूरो |

गोरखपुर/लखनऊ: आयुर्वेद के इतिहास में इस पद्धति के दवाओं की उतनी बिक्री नहीं हुई जितनी कोरोना के वैश्विक संकट काल में हुई। दुनियाभर ने भारत की देन आयुर्वेद का लोहा माना है। आज अमेरिका में 70 फीसद लोग आयुर्वेद की दवाओं की ओर उन्मुख हैं। इसका कारण यह है कि यह पद्धति रोगी के रोग को तो ठीक ही करती है, उसकी प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाती है। आयुर्वेद ऐसी विधा है जो चिकित्सा जगत को काफी आगे ले जा सकती है।

यह बातें राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय हंडिया (प्रयागराज) के सेवानिवृत्त प्राचार्य प्रो. (डॉ.) जीएस तोमर ने कही। वह गुरुवार को महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, आरोग्यधाम की संस्था गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आयुर्वेद कॉलेज) में बीएएमएस प्रथम वर्ष के नवागत विद्यार्थियों के दीक्षा पाठ्यचर्या (ट्रांजिशनल करिकुलम) समारोह के चौथे दिन आयुर्वेद की महत्ता पर प्रकाश डाल रहे थे।

उन्होंने कहा कि आयुर्वेद रोगी के रोग के अनुसार इलाज करने की पद्धति है और इसमें किसी भी प्रकार का साइड इफेक्ट नहीं होता। आयुर्वेद में एक तरह की बीमारी में अलग अलग व्यक्तियों को अलग तरह की दवाएं मिलती हैं। प्रो तोमर ने बताया कि आयुर्वेद में किसी तरह की एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नहीं होता और इससे पुरानी से पुरानी बीमारी का सफलता से इलाज होता है। उन्होंने आज के दौर में आम हो चुकी डायबिटीज के इलाज की एलोपैथ और आयुर्वेद के बीच तुलना करते हुए कहा कि आयुर्वेद न केवल ग्लूकोज लेवल का प्रबंधन करता है बल्कि डायबिटीज से प्रभावित होने वाले अंगों की भी रक्षा करता है।

कम्प्लीमेंट्री अल्टरनेटिव मेडिसिन की उपयोगिता को समझना जरूर : प्रो राजकिशोर

दीक्षा पाठ्यचर्या में बीआरडी मेडिकल कॉलेज में मेडिसिन विभाग के प्रो. राजकिशोर सिंह ने ‘इंट्रोडक्शन टू मॉडर्न मेडिसिन एंड अदर सिस्टम ऑफ मेडिसिन’ विषय पर विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि आरोग्यता के आठ आयाम होते हैं। भावनात्मक, आध्यात्मिक, बौद्धिक, सामाजिक, पेशेगत, वित्तीय, पर्यावरणीय और भौतिक। उन्होंने बताया कि रोगों के निदान के लिए कम्प्लीमेंट्री अल्टरनेटिव मेडिसिन, कम्प्लीमेंट्री मेडिसिन, अल्टरनेटिव मेडिसिन और इन्टरगेटिव मेडिसिन का उपयोग किया जाता है। इसमें कम्प्लीमेंट्री अल्टरनेटिव मेडिसिन की उपयोगिता को इस परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है कि इससे रोगी को किसी प्रकार का नुकसान न हो। प्रो. सिंह ने कहा कि प्राकृतिक उत्पाद, आयुर्वे, योग, एक्यूप्रेशर, मेडिटेशन आदि कम्प्लीमेंट्री अल्टरनेटिव मेडिसिन का ही अंग हैं। एक अनुमान के मुताबिक 1997 में ही 15 मिलियन वयस्क हर्बल रेमेडीज का परामर्श ले रहे थे।

आयुर्वेद कॉलेज में खुल रहा उत्तर भारत का सबसे बड़ा पंचकर्म केंद्र

एक अन्य सत्र में आयुर्वेद के इतिहास दर्शन अवधारणा विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज में क्रिया विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) सच्चिदानंद सिंह ने बताया कि उत्तर भारत का सबसे बड़ा पंचकर्म केंद्र इसी आयुर्वेद कॉलेज में खोला जा रहा है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद को पंचम वेद भी कहते हैं और इसके सिद्धांतों को आज तक कोई गलत नहीं ठहरा सका है। आयुर्वेद का प्रयोजन स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी व्यक्ति के रोग का निदान कर आरोग्यता प्रदान करना है।

शोध, मौलिकता व उपयोगिता ही किसी विश्वविद्यालय की पहचान : डॉ प्रदीप राव

दीक्षा पाठ्यचर्या समारोह में गुरुवार के पहले सत्र में महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, आरोग्यधाम के कुलसचिव डॉ. प्रदीप कुमार राव ने “हमारा विश्वविद्यालय” विषय पर सारगर्भित वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि शोध, उसकी मौलिकता व उपयोगिता को लेकर महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय की अवधारणा बिल्कुल स्पष्ट है क्योंकि शोध, मौलिकता व उपयोगिता ही किसी विश्वविद्यालय की पहचान होती है।

गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस सिर्फ अध्ययन का संस्थान नहीं है बल्कि प्राचीनतम आयुर्वेद को नवीनतम शोध व अनुसंधान से जन आरोग्यता का मंत्र बनाने का भविष्य का केंद्र है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद की महत्ता को देखते हुए डीआरडीओ और आईआईटी जैसी संस्थाएं भी इस पर शोध कर रही हैं।

उन्होंने बताया कि बीएएमएस का बैच प्रारम्भ करने के साथ ही इस विश्वविद्यालय ने एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू करने के लिए पहल कर दी है। डॉ. राव ने विश्वविद्यालय द्वारा तय मानकों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्र वंदना, ज्ञान वंदना व धर्म वंदना प्रार्थना सभा के प्रमुख स्तम्भ हैं। इसलिए पूरी प्रार्थना का ज्ञान व उसका गान अवश्य होना चाहिए।

वक्ताओं का स्वागत गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के प्राचार्य डॉ. पी. सुरेश ने किया। कार्यक्रमों में प्रो. (डॉ) गणेश पाटिल, डॉ सुमित, डॉ प्रज्ञा सिंह, डॉ पीयूष वर्सा, डॉ प्रिया नायर आदि की सक्रिय सहभागिता रही।

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