Monday, May 25, 2026
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सावधान! यह ‘कूड़ा बम’ है

 

Samvad 33


Pankaj Chaturvadi jpg 220 अप्रैल को दिल्ली में गाजीपुर के कूड़ा पहाड़ में फिर से आग सुलग गई। यह इस महीने में तीनसी बार हुआ। हर बार की तरह आग पर तो काबू पा लिया गया, लेकिन घना दमघोटूं धुआं चौबीस घंटे छाया रहा। जब तापमान 42 से पार हो और सांस लेने के लिए जहरीला धुआं तो जान सकते हैं कि उन हजारो ंलोगों की जिंदगी कितनी दुश्वारी में कट रही होगी। चूंकि दिल्ली तो राजधानी है, सो उसकी चर्चा हो जाती है, लेकिन देश के हर छोटे-बडे शहर ही नहीं गांव तक अब कूड़ा खतरा बनता जा रहा है। तभी अभी 23 अप्रैल 2022 को एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एके गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि दिल्ली समेत दूसरे शहरों में मौजूद कचरा फेंकने की जगहें किसी ‘टाइम बम’ की तरह हैं, क्योंकि इन जगहों पर लगातार मीथेन गैस पैदा होती है, जिससे आग लगने और विस्फोट होने का खतरा बना रहता है। न्यायमूर्ति एके गोयल का कहना है कि डंपिंग साइटों पर आग लगने की घटनाएं अन्य शहरों में भी हो रही हैं, जो बेहद चिंता की बात है।
इससे पहले दिनांक 13 अप्रैल 2022 को दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला ने स्वत: संज्ञान लेते हुए नगर निगम से पूछा है कि आखिर क्यों गाजीपुर कूड़ा ढलाव में बार-बार आग लगती है, जिससे उपजे जहरीले धुएं से भारी वायु प्रदूषण होता है। याद करें इससे पहले 18 दिसंबर 2014 को दिल्ली हाई कोर्ट चेतावनी दी थी कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो दिल्ली जल्दी ही ठोस कचरे के ढेर में तब्दील हो जाएगी। दिल्ली में अभी तक कोई दो करोड़ मीट्रिक टन कचरा जमा हो चुका है और हर दिन 11,400 मीट्रिक टन कूड़ा पैदा हो रहा है जिसमें से दो हजार टन प्लास्टिक का लाइलाज कचरा होता है।

हमारे देश के शहर हर दिन लगभग 1,50,000 टन ठोस कचरा (एमएसडब्ल्यू) उगल रहे हैं, जिसमें से महज 25 फीसदी का प्रसंस्करण होता है। बाकी बचा कचरा या तो खुले में फेंक दिया जाता है या जला दिया जाता है। वर्ष 2030 तक कचरे की यह मात्रा 4,50,000 टन प्रतिदिन हो जाएगी। सालों से हमारे यहां इस कूड़े से बिजली बनाने की चर्चा रही है लेकिन यह प्रयोग बुरी तरह असफल रहा। इस तरह का पहला संयंत्र (डब्ल्यूटीई) दिल्ली के तिमारपुर में 1987 में लगा, लेकिन चला नहीं। तब से देश में 130 मेगावाट क्षमता के 14 और डब्ल्यूटीई संयंत्र लगाए गए, लेकिन इनमें से आधे बंद हो चुके हैं। बाकी पर पर्यावरण नियमों की अनदेखी की जांच चल रही है। इन संयंत्रों के फेल होने का कारण कचरे की गुणवत्ता और संघटन है। कचरे में नमी ज्यादा होती है सो जलाने में अधिक ऊर्जा लगती है, जबकि बिजली कम मिलती है।

राजधानी दिल्ली में कचरे का निबटान अब हाथ से बाहर निकलती समस्या बनता जा रहा है। अनुमान है 2023 तक यह महानगर 16 हजार मीट्रिक टन कचरा उपजाएगा। फिलहाल महानगर का कचरा खपाने के तीन खत्ते या डंपिंग ग्राउंड हैं-गाजीपुर, ओखला और भलस्वा। गाजीपुर में कूड़ा खाने का कार्य जब सन 1984 में शुरू हुआ था तो इसकी क्षेत्रफल 30 एकड़ हुआ करता था, जो आज 76 एकड़ हो गया। नियम है कि कूड़े के ढेर की ऊंचाई अधिकतम 20 मीटर हो, लेकिन गाजीपुर का पहाड़ 50 मीटर से आगे निकल गया है।

सरकारी रिकार्ड कहता है कि यह स्थान पर सन 2006 में ही कह दिया गया था कि अब यहां और कूड़ा नहीं खपाया जा सकता, इसके बावजूद यहां आज भी हर दिन छह सौ ट्रक कूड़ा आता है, जो लगभग 2000 टन होता है। अक्तूबर 2019 में यहां कोई 140 मीट्रिक टन कूड़े का अनुमान था और कम करने की कवायद शुरू हुई थी। यहां 25 ट्रमेल मशीनें लगाई गर्इं, जो सवा दो साल में महज 9.6 लाख मीट्रिक टन कूड़े का निष्पादन कर पाई हैं|

और अभी भी 130 लाख मीट्रिक टन कूड़ा बकाया है। जाहिर है कि इस गति से मौजूदा कूड़े को खतम करने में 13 साल लगेंगे। फिर हर दिन इस खंती में नया कूड़ा भी आ रहा है। विडंबना है कि दिल्ली के अपने कूड़े-ढलाव कई साल पहले पूरी तरह भर गए हैं और आसपास 100 किलोमीटर दूर तक कोई नहीं चाहता कि उनके गांव-कस्बे में कूड़े का अंबार लगे।
दिल्ली के कूड़े में बड़ी मात्रा में सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों और मोबाइल का है। इसमें पारा, कोबाल्ट, और न जाने कितने किस्म के जहरीले रसायन होते हैं। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलो ग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा लेड और 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता हे। शेष हिस्सा प्लास्टिक होता है।

इसमें से अधिकांश सामग्री गलती-सड़ती नहीं है और जमीन में जज्ब हो कर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने का काम करती है। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाइलो ंसे भी उपज रहा है।

असल में कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला फाउंटेन पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल-पेन आए, जिनकी केवल रिफिल बदलती थी। आज बाजार में ऐसे पेनों को बोलबाला है जो खत्म होने पर फेंक दिए जाते हैं। जरा सोचें कि तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में बामुश्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह शेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले ‘यूज एंड थ्रो’ वाले रेजर ही बाजार में मिलते हैं। अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन ले कर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फेंकी जाती हैं।

लंदन में प्रत्येक रेस्टोरेंट में गिलास, उसके ऊपर लगे ढक्कन, बचे खाने को वहीं अलग-अलग किया जाता है और हर बेकार को रिसाइकिल किया जाता है। यह अनिवार्य है कि दिल्ली के कूड़े को ठिकाने लगाने के लिए नए ठिकाने तलाशें जाएं, इससे भी ज्यादा अनिवार्य है कि कूड़ा कम करने के सशक्त प्रयास हों।

इसके लिए केरल में कन्नूर जिले से सरीख ले सकते हैं, जहां पूरे जिले में बॉल पेन के इस्तेमाल से लोंगों ने तौबा कर ली, क्योंकि इससे हर दिन लाखों रिफील का कूड़ा निकलता था। पूरे जिले में कोई भी दुकानदार पॉलीथीन की थैली या प्लास्टिक के डिस्पोजेबल बर्तन न तो बेचता है और न ही इस्तेमाल करता है। जाहिर है, अनिवार्यता कूड़े को कम करने की होना चाहिए। जब कूड़ा कम होगा तो उसके निबटान में कम संसाधन व स्थान की जरूरत होगी।


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