
कृषि आदिकाल से हमारे समाज के लिए जीवनयापन का जरिया रहा है।वास्तव में बीजोपचार व्याधियों जो बीज के ऊपरी तथा अंदरूनी भाग में विद्यमान रहती है। उनको हटाने के उद्देश्य से किया जाता है जो आंखों से तो दिखाई नहीं देता परंतु अनौपचारिक बीज की बुआई के बाद अंकुरण में भारी कमी के बाद ही परिलक्षित हो पाती है।
अनुसंधान के परिणाम और जो कृषक बीजोपचार करते हैं उनके अनुभव से यह बात सामने आई है कि उपचारित बीज एक तीर से दो शिकार का काम करते हैं पहला बीजारूढ़ फफूंद जो अंकुरण में बाधक होती है को नष्ट करते हैं, दूसरा उपचारित बीज भूमि में पड़कर भूमिगत फफूंदी जो कोमल जड़ों को नष्ट करने का कार्य कर सकती है की सक्रियता पर विराम लगाकर संतोषजनक अंकुरण तथा कोमल पौधों को पलने-पुसने में मददगार होते हैं।
अच्छा अंकुरण अच्छी पौध संख्या तो अच्छा उत्पादन यह एक स्वयं सिद्ध बात है अत: जितनी अच्छी पौध संख्या उतना ही अच्छा उत्पादन यह सिद्धांत अचूक होता है। एक बार बीजोपचार का सुरक्षा चक्र पहनाकर बीज को मैदान में छोड़ दिया जाए तो कोई कारण नहीं बनता कि विजय हाथ नहीं लगे। यह जानकर विश्वास नहीं होगा कि पत्तियों पर आने वाले अधिकांश रोगों की जड़ बीज ही होता है।
यदि बीज का उपचार नहीं किया गया हो तो गेहूं का झुलसा, बीज, जड़ सड़न, कालाधब्बा तथा कंडुआ जैसी खतरनाक बीमारियां अपना विस्तार करने में नहीं चूकती हैं। कंडुआ रोग की कवक बीज के अंदर बीज जब बनना शुरू होता है उसी समय प्रवेश कर लेती है और बीज की परिपक्वता तक बीज के भीतर छुपी रहती है और इस प्रकार का दूषित बीज यदि उपचारित नहीं किया गया हो तो कालान्तर में एक रोगी पौध से अनेक और इस अनेक से पूरा खेत कंडुआ का होने में समय नहीं लगेगा हम गेहूं की बुआई करेंगे और कंडुआ काटना होगा।
बीजोपचार की मशीनें आजकल गांव-गांव में उपलब्ध हैं। यदि मशीन नहीं है तो मिट्टी के घड़ों में बीज भरकर दवाई डालकर मुंह पर कपड़ा बांध कर हिला-डुलाकर सरलता से बीजोपचार किया जा सकता है।
आमतौर पर गेरूआ रोग की कवक हवा के द्वारा आती है, परंतु मटर, मसूर का गेरूआ भी बीजारूढ़ होता है जिसका निदान केवल बीजोपचार है। दलहनी फसलों में बीजोपचार का अपना अलग महत्व तथा हिसाब होता है। दलहनों का उपचार फफूंदनाशी, कल्चर तथा पीएसबी तीन प्रकार से किया जाता है तथा चौथा उपचार दीमक के लिए भी यथास्थिति किया जा सकता है। आमतौर पर दलहनों के लिए अच्छे से खेत की तैयारी एक प्रश्न चिन्ह ही रहता है।
यदि उसके बाद बीजोपचार भी नहीं किया जाए तो करेला और नीम चढ़ा हो जाएगा। फफूंदनाशी से उपचार से फफूंदी पर विराम लगता है। कल्चर के उपचार से वायुमंडल की नत्रजन और पीएसबी के उपचार से भूमि में गढ़े फास्फोरस की उपलब्धता के लिए ताले खोले जा सकते हैं और दलहन से अधिक से अधिक उत्पादन संभव हो सकता है। रबी में बुआई के लिए पर्याप्त समय मिलता है। इस कारण बीजोपचार तसल्ली से किया जा सकता है।


