- डीएफओ का दावा, रिकॉर्ड पौधरोपण से वन क्षेत्र में होगी बढ़ोत्तरी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: भले ही भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट में मेरठ के वन क्षेत्र को स्थिर दिखाया गया हो और तमाम जनपदों में वन क्षेत्र को घटता दर्शाया गया हो, लेकिन वनाधिकारियों को पूरा भरोसा है कि विकास की सड़कों के निर्माण ने भले ही फौरी तौर पर वन क्षेत्र की प्रगति पर रोक लगा दी हो, लेकिन आने वाला वक्त सकारात्मक होगा और वन क्षेत्र बढ़ेगा। रिपोर्ट के मुताबिक 2019 की तुलना में मेरठ, बागपत और बुलंदशहर में भी वन क्षेत्र में कोई वृद्धि नहीं हुई है।
गौतमबुद्ध नगर में कुल 1,282 वर्ग किमी के भौगोलिक क्षेत्र में 20 वर्गमीटर का वन क्षेत्र है, जो लगभग 1.56 प्रतिशत है। इसी तरह गाजियाबाद में कुल 1,179 वर्ग किमी में से केवल 25.22 वर्गमीटर का वन क्षेत्र है। वन स्थिति रिपोर्ट 2021 के अनुसार प्रदेश के 10 जिलों में वन क्षेत्र घटा है। इनमें मीरजापुर, सोनभद्र, आजमगढ़, बिजनौर, चंदौली, लखीमपुर, महाराजगंज, मुजफ्फरनगर पीलीभीत व सुल्तानपुर जिले हैं।

इन जिलों के अफसरों को नोटिस देकर स्पष्टीकरण मांगा गया है। जवाब आने के बाद दोषियों पर कार्रवाई की जाएगा। गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर में 2019 की तुलना में वन क्षेत्र में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों जिलों में 2019 की तुलना में वन क्षेत्र में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।
इससे पहले 2017 की तुलना में भी 2019 में गौतम बुद्ध नगर में कोई बदलाव नहीं हुआ था। वन संरक्षक गंगा प्रसाद ने बताया कि मुद्दा जमीन की उपलब्धता को लेकर भी है। यही कारण है कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए पेड़ों की कटाई के लिए दी गई अनुमति के बदले हम जो वनरोपण करते हैं, वह श्रावस्ती, चित्रकूट और झांसी जैसे जिलों में किया जाता है।
डीएफओ राजेश कुमार ने बताया कि दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम, दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, मेरठ-बुलंदशहर और ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे जैसी कुछ बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण हजारों पेड़ काटे गए है। हालांकि हर साल काफी तादाद में पौधरोपण भी किया गया है।
इसके रिजल्ट अभी आने वाले हैं और तब सर्वे रिपोर्ट के आंकड़े बदल जाएंगे। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे में चरण चार (डासना से मेरठ) में 11,025 पेड़ काटे गए थे। डीएफओ का कहना है कि एनएचएआई द्वारा जो पेड़ काटे गए, उनके बदले में जो धनराशि मिली उससे पौधरोपण अभियान चलाया गया।
वहीं तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि विकास की सड़कों के निर्माण के कारण सड़कों से पेड़ नदारद हो गए हैं और उनकी जगह नये पेड़ कहीं और लगाए जा रहे है। इससे लोगों की निगाह में हरियाली तो घटी ही है और इसका सीधा असर वन क्षेत्र पर पड़ा है। हालांकि अधिकारी भविष्य को लेकर लाख दावा करते रहे, लेकिन हकीकत में सड़कें सूनी हो गई है।

