Friday, April 24, 2026
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कहानी क्या होती है?

Ravivani 33


SHAILENDRA CHAUHAN 2हिंदी के लेखकों में प्रेमचंद पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपने लेखों में कहानी के सम्बंध में अपने विचार व्यक्त किए हैं। प्रेमचन्द ने कहानी की परिभाषा इस प्रकार से की है: ‘कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता। कहानी (गल्प) एक रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग यानि एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा-विन्यास, सब उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं। उपन्यास की भांति उसमें मानव-जीवन का संपूर्ण तथा बृहत रूप दिखाने का प्रयास नहीं किया जाता। वह ऐसा रमणीय उद्यान नहीं जिसमें भांति-भांति के फूल, बेल-बूटे सजे हुए हैं, बल्कि एक गमला है जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है।’ रोचकता, प्रभाव तथा वक्ता एवं श्रोता या कहानीकार एवं पाठक के बीच यथोचित सम्बद्धता बनाए रखने के लिए सभी प्रकार की कहानियों में कुछ तत्व महत्वपूर्ण माने गए हैं-जैसे कथावस्तु, पात्र अथवा चरित्र-चित्रण, कथोपकथन अथवा संवाद, देशकाल अथवा वातावरण, भाषा-शैली तथा उद्देश्य। कहानी के ढांचे को कथानक अथवा कथावस्तु कहा जाता है। प्रत्येक कहानी के लिए कथावस्तु का होना अनिवार्य है, क्योंकि इसके अभाव में कहानी की रचना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कथानक के चार अंग माने जाते हैं-आरम्भ, आरोह, चरम स्थिति एवं अवरोह। कहानी का संचालन उसके पात्रों के द्वारा ही होता है तथा पात्रों के गुण-दोष को उनका ‘चरित्र चित्रण’ कहा जाता है। चरित्र चित्रण से विभिन्न चरित्रों में स्वाभाविकता उत्पन्न की जाती है। संवाद कहानी का प्रमुख अंग होते हैं। इनके द्वारा पात्रों के मानसिक अन्तर्द्वन्द एवं अन्य मनोभावों को प्रकट किया जाता है। कहानी में वास्तविकता का पुट देने के लिए देशकाल अथवा वातावरण का प्रयोग किया जाता है। प्रस्तुतीकरण के ढंग में कलात्मकता लाने के लिए उसको अलग-अलग भाषा व शैली से सजाया जाता है। कहानी में केवल मनोरंजन ही नहीं होता, अपितु उसका एक उद्देश्य भी होता है।

कहानी, हिंदी में गद्य लेखन की एक विधा है। उन्नीसवीं सदी में गद्य में एक नई विधा का विकास हुआ जिसे कहानी के नाम से जाना गया। बंगला में इसे गल्प कहा जाता है। कहानी ने अंग्रेजी से हिंदी तक की यात्रा बंगला के माध्यम से की। मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना तथा सुनना मानव का आदिम स्वभाव बन गया। इसी कारण से प्रत्येक सभ्य तथा असभ्य समाज में कहानियां पाई जाती हैं। हमारे देश में कहानियों की बड़ी लंबी और सम्पन्न परंपरा रही है। प्राचीनकाल में सदियों तक प्रचलित वीरों तथा राजाओं के शौर्य, प्रेम, न्याय, ज्ञान, वैराग्य, साहस, समुद्री यात्रा, अगम्य पर्वतीय प्रदेशों में प्राणियों का अस्तित्व आदि की कथाएं, जिनकी कथानक घटना प्रधान हुआ करती थीं, भी कहानी के ही रूप हैं। प्राय: कहानियों में असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की और अधर्म पर धर्म की विजय दिखाई गई हैं।

1910 से 1960 के बीच हिंदी कहानी का विकास जितनी गति के साथ हुआ उतनी गति किसी अन्य साहित्यिक विधा के विकास में नहीं देखी जाती। सन 1900 से 1915 तक हिंदी कहानी के विकास का पहला दौर था। मन की चंचलता (माधवप्रसाद मिश्र) 1900, गुलबहार (किशोरीलाल गोस्वामी) 1902, पंडित और पंडितानी (गिरिजादत्त वाजपेयी) 1903, ग्यारह वर्ष का समय (रामचंद्र शुक्ल) 1903, दुलाईवाली (बंगमहिला) 1907, विद्या बहार (विद्यानाथ शर्मा) 1909, राखीबंद भाई (वृन्दावनलाल वर्मा) 1909, ग्राम (जयशंकर ‘प्रसाद’) 1911, सुखमय जीवन (चंद्रधर शर्मा गुलेरी) 1911, रसिया बालम (जयशंकर प्रसाद) 1912, परदेसी (विश्वम्भरनाथ जिज्जा) 1912, कानों में कंगना (राजाराधिकारमण प्रसाद सिंह) 1913, रक्षाबंधन (विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’) 1913, उसने कहा था (चंद्रधर शर्मा गुलेरी) 1915 आदि के प्रकाशन से सिद्ध होता है कि इस प्रारंभिक काल में हिंदी कहानियों के विकास के सभी चिह्न मिल जाते हैं।

प्रेमचंद के आगमन से हिंदी का कथा-साहित्य आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की ओर मुड़ा। और प्रसाद के आगमन से रोमांटिक यथार्थवाद की ओर। चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी ‘उसने कहा था’ में यह अपनी पूरी रंगीनी में मिलता है। सन 1922 में उग्र का हिंदी-कथा-साहित्य में प्रवेश हुआ। उग्र न तो प्रसाद की तरह रोमैंटिक थे और न ही प्रेमचंद की भांति आदर्शोन्मुख यथार्थवादी। वे केवल यथार्थवादी थे-प्रकृति से ही उन्होंने समाज के नंगे यथार्थ को सशक्त भाषा-शैली में उजागर किया। 1927-1928 में जैनेंद्र ने कहानी लिखना आरंभ किया। उनके आगमन के साथ ही हिंदी-कहानी का नया उत्थान शुरू हुआ। 1936 प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हो चुकी थी।

इस समय के लेखकों की रचनाओं में प्रगतिशीलता के तत्व का जो समावेश हुआ उसे युगधर्म समझना चाहिए। यशपाल राष्ट्रीय संग्राम के एक सक्रिय क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे, अत: वह प्रभाव उनकी कहानियों में भी आया। अज्ञेय प्रयोगधर्मा कलाकार थे, उनके आगमन के साथ कहानी नई दिशा की ओर मुड़ी। जिस आधुनिकता बोध की आज बहुत चर्चा की जाती है उसके प्रथम पुरस्कर्ता अज्ञेय ही ठहरते हैं। अश्क प्रेमचंद परंपरा के कहानीकार हैं। अश्क के अतिरिक्त वृंदावनलाल वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, इलाचन्द्र जोशी, अमृतलाल नागर आदि उपन्यासकारों ने भी कहानियों के क्षेत्र में काम किया है। किंतु इनका वास्तविक क्षेत्र उपन्यास है कहानी नहीं। इसके बाद सन 1950 के आसपास से हिन्दी कहानियां नए दौर से गुजरने लगीं। आधुनिकता बोध की कहानियां या नई कहानी नाम दिया गया।

‘नई कहानी’ शब्द का प्रयोग सबसे पहले दिसम्बर 1957 में सम्पन्न साहित्यकार सम्मेलन में किया गया। सन 1962 में कहानी के परिसंवाद में कहानी के नएपन पर चर्चा हुई। तभी से यह शब्द प्रचलित हो गया नई कहानी के इस दौर के प्रमुख कहानीकारों में मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी, ऊषा प्रियंवदा, हरिशंकर परसाई, रमेश बक्शो, फणीश्वरनाथ रेणु, शिवानी, मालती जोशी इत्यादि प्रमुख हैं। इसके बाद के कहानीकारों में दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, रवींद्र कालिया, ममता कालिया, मैत्रेयी पुष्पा, मृदुला गर्ग, इत्यादि का नाम लिया जाता है।
अकहानी के उद्भव के संबंध में डॉ. रामदरश मिश्र ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘हिन्दी कहानी- अंतरंग पहचान’ में महत्वपूर्ण संकेत दिए है। अकहानी को यदि आंदोलन के रूप में न लें तो हम पाएंगे कि यह कहानी संरचना में नई कहानी का सहज विकास है। इसके अनुसार नई कहानी ने सातवें दशक में यही मोड़ लिया था। इस युग के प्रमुख कहानीकार-कृष्ण बलदेव वैद, रमेश बक्षी, गिरिराज किशोर, दूधनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, श्रीकांत वर्मा और शरद जोशी हैं।

1960 तक आते-आते नई कहानी को सीमाएं प्रकट होने लगी थीं। निरर्थकता और निष्क्रियता ने इस युग की कहानी को घेर लिया था। इसके प्रमुख कहानीकार-धर्मेन्द्र गुप्त, जगदीश चतुर्वेदी, मधुकर सिंह, मनहर चौहान, महीप सिंह, योगेश गुप्त, वेद राही, श्याम परमार तथा हिमांशु जोशी हैं।

1970 के आस-पास नई कहानी कुण्ठित हो चुकी थी। शिल्प का उलझाव और अप्रामाणिक जमीन, दोनों ने कहानी को आम आदमी से अलग कर दिया था। इसी समय समानान्तर कहानी का जन्म हुआ जो आम आदमी की जीवन स्थितियों को शिल्पगत चमत्कार के भंवर से मुक्त कर सकी। यह कहानी राजनैतिक लड़ाइयों को सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य भी देती है और सांस्कृतिक संघर्ष को राजनैतिक दृष्टि भी समानान्तर कहानी आंदोलन के प्रमुख कहानीकार हैं- हरिशंकर परसाई, कमलेश्वर, भीष्म साहनी, शरद जोशी आदि।


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