
भारतीय क्रिकेट टीम के जांबाजों ने अफगानिस्तान के खिलाफ धमाकेदार खेल दिखाया। विराट कोहली ने बारह के औसत से 122 रन ठोंक डाले। केएल राहुल ने भी 62 रन ठोंककर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। भुवनेश्वर ने अपना सर्वश्रेष्ठ दिखाया और चार ओवर में चार रन देकर अफगानिस्तान की आधी टीम को पवेलियन भेज दिया। एशिया कप 2022 का यह अब तक का सबसे बड़ा स्कोर था। बदले में अफगानिस्तान की टीम विराट कोहली के रनों से ग्यारह रन पहले 111 रन पर ढेर हो गई। भारत ने बड़ी जीत दर्ज की लेकिन इस जीत के कोई मायने नहीं हैं। यह ऐसी जीत है, जिस पर हार भी हंसती है। इस जीत के बाद एशिया कप से भारत बाहर हो गया। टूर्नामेंट के दूसरे चरण में भारतीय खिलाड़ियों ने जो खेल दिखाया, वह बहुत लचर और उनकी प्रतिष्ठा के सर्वाधिक प्रतिकूल था। अलबत्ता एशिया कप अफगानिस्तान की टीम के जांबाज प्रदर्शन के लिए भी क्रिकेट प्रेमी याद रखेंगे। दूसरे राउंड के दोनों मैचों में भारतीय बल्लेबाजों ने पाकिस्तान के खिलाफ 181 और श्रीलंका के खिलाफ 173 रन बनाए। इसके विपरीत गेंदबाजों का प्रदर्शन दोयम दर्जे का रहा। दोनों ही मैचों में गेंदबाज विकेट के लिए जूझते रहे, लेकिन आक्रमण इतना कमजोर था कि विपक्षी टीम के एक बार भी दस विकेट नहीं गिरे और न ही रनों पर अंकुश लगा। उन्होंने भारतीय गेंदबाजों के आक्रमण की धज्जियां उड़ा दीं, जिससे एक बार भी टार्गेट डिफेंड नहीं किया जा सका। फील्डिंग तो चौथे दर्जे की गई। यह इसलिए नहीं हुआ कि हमारे देश में खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि हम किसी भी टूर्नामेंट में खिलाड़ी नहीं जुगाड़ी ले जाते हैं। खिलाड़ी बैठे टापते रह जाते हैं और चूंचूं के मुरब्बा वाली बीसीसीई के चयनकर्ताओं का काक्स अपने प्यारों दुलारों को चुनता है। ऐसे खिलाड़ियों को चुनता है, जिनके खेल का हर विभाग संदिग्ध है और ऐसे को बाहर का रास्ता दिखा देता है, जो इसके वास्तविक हकदार हैं।
हमारे पास दुनिया का बेहतरीन बॉलर शामी है, 160 की स्पीड से गेंद फेंकने वाला उमरान है, दीपक चहर है, बेहतरबल्लेबाज इशांत किशन है, वेस्ट फिनिशर तेवतिया है, लेकिन नहीं हम तो आउट आॅफ फार्म के एल राहुल को ले जाएंगे, जो जिम्बाब्वे की क्लब जैसी टीम के सामने तक फ्लॉप रहे थे। वे आवेश खान जो आईपीएल में जम कर कूटे गए थे। जिम्बाब्वे वालों ने ही नहीं हांगकांग की नौसिखिया टीम ने ऐसा पीटा कि भारत के सामने हार का खतरा पैदा हो गया। भुवनेश्वर भी उतने कामयाब नहीं हो पा रहे हैं, जैसी उनकी छवि गढ़ी गई है। अगर कोई यह तर्क देता है कि अनुभव के कारण इन खिलाड़ियों को लिया जाता है, गलत तर्क है। खेल में अनुभव उतना कारगर नहीं होता जितना जीत के लिए जूझ जाने का जूनून।
भारतीय टीम में उस जूनून का अभाव था। अभाव न होता तो अर्शदीप से भारत को हार की मंजिल तक लेजाने वाला कैच नहीं छूटता। कैच किसी से भी छूट सकता है बल्कि छूटता रहा है। दुनिया का कौन सा खिलाड़ी खम ठोंक कर कह सकता है कि उससे कभी कोई कैच नहीं छूटा। लेकिन जब प्रतिष्ठा का प्रश्न हो, तब खेल में स्थायी एकाग्रता दिखाई जाती है। निसंदेह कोई कैच नहीं छोड़ना चाहता। अर्शदीप भी नहीं चाहते थे। कैच छूटने पर फील्डर का मन होता है कि वह गड्ढा खोद कर उसमें समा जाए। अर्शदीप ने भी ऐसी ही कामना की होगी, लेकिन यह छूटा कैच न क्रिकेट प्रेमियों का कभी पीछा छोड़ेगा और न अर्शदीप का। आखिरी गेंद पर मियांदाद द्वारा मारे गए छक्के की तरह।
गेंदबाजी का भारतीय विभाग कितना कमजोर साबित हुआ इसे ऐसे समझा जा सकता है कि हांगकांग की क्लब स्तर की टीम को हराने में हमारे गेंदबाजों के पसीने छूट गए। जब तक बीस ओवर पूरे नहीं हो गए तब तक यही लगता रहा कि मैच भारत की हाथ से निकल रहा है। पाकिस्तान ने हांगकांग की टीम को मात्र 38 रन पर ही आउट कर दिया। श्रीलंका के खिलाफ भी बॉलर रन लुटाते ही दिखे। इसमें हम जीता हुआ मैच हार गए तो इसलिए कि गेंदबाज तो चार के आगे विकेट नहीं गिरा पाए। फील्डरों ने भी बहुत खराब फील्डिंग का प्रदर्शन किया। पाकिस्तान के खिलाफ भी खराब फील्डिंग हारने का एक बड़ा कारण रही। अगर सभी टीमों के समग्र प्रदर्शन की बात करें तो अफगानिस्तान की टीम का प्रदर्शन सर्वोच्च स्तर का था। उन्होंने खेल के हर विभाग में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। उनके बॉलरों ने पाकिस्तान जैसी सशक्त टीम को जीत के लाले डाल दिए थे। यदि उनके हाथ में बीस पचीस रन और होते तो पाकिस्तान की जीत संदिग्ध हो जाती।
आगे भारतीय टीम आस्ट्रेलिया के दौरे पर 20 सितंबर से खेलेगी। फिर 27 सितंबर से ही दक्षिण अफ्रीका से और उसके आगे अक्टूबर में 20-20 का विश्वकप टूर्नामेंट है। तगड़ी लड़ाई है। भारत के लिए और भी तगड़ी। इसलिए भी तगड़ी कि जीतने के लिए खेलने वाली सोच का अभाव है और खिलाड़ियों के चयन का कोई मानक नहीं है। विश्व स्तरीय बॉलर युजवेंद्र चहल को बाहर बैठाल दिया जाता है और लगातार खराब प्रदर्शन कर रहे बॉलर को प्राथमिकता दी जाती है। जिससे लगता है कि चयन के लिए खिलाड़ी का प्रदर्शन नहीं कोई और आधार है। चयनकर्ताओं को अपनी प्रतिबद्ध सोच से ऊपर उठ कर हकदार खिलाड़ियों का चयन करना होगा। उन्हें चुनना होगा जो हार को जीत में बदलने का माद्दा रखते हों। जुगाड़ियों को नहीं, खिलाड़ियों को चुनना होगा। तभी हम अगली मंजिल सर कर पाएंगे।


