- गढ़मुक्तेश्वर गंगा मेले में आने वाले श्रद्धालुओं से मुख्य मार्गों पर लगा भीषण जाम
- आठ दिन आस्था और मौज मस्ती बिता रोजमार्रा के कार्य पर लौट रहे हैं लोग
जनवाणी संवाददाता |
गढ़मुक्तेश्वर: अटूट आस्था और परंपरा का प्रतीक और 12 दिन तक अनवरत चलने वाला कार्तिक गंगा मेला आखिर अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंच गया। औपचारिक तौर पर मेले का समापन दो दिन बाद होना है, लेकिन कार्तिक स्नान के बाद सोमवार की मध्यरात्रि से ही तंबू उखड़ने लगे और भैंसा बुग्गी के रेले वापस रवाना होने लगे। इस मेले में जहां आस्था का सैलाब दिखा, वहीं अमीरी और गरीबी की खाई भी दिखाई दी।
यह सनातन आस्था ही है जो गंगा को मां मानते हुए उसके किनारे इस कदर भीड़ में बदल गई कि वहां मानव समुद्र दिखाई देने लगा। भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने चतुर्दशी और पूर्णिमा का स्नान कर मानो अपने पापों को तर लिया हो। आस्था के सैलाब का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सोमवार की शाम को ऐसा जाम लगा कि वह 10 किमी से लंबा हो गया और हापुड़ से जाने वाले वाहनों को गंगा मेले में पहुंचने के लिए कई कई घंटे लग गए।

यहां तक कि 10 बजे के बाद तो उन बसों को भी सिंभावली में रोका जाने लगा, जिनमें श्रद्धालु सवार थे। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये श्रद्धालु कैसे गंगा तक पहुंच पाए होंगे। जिधर देखो उधर सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे। जाम के कारण वाहन आगे खिसकने शुरू हुए तो महिलाएं तक भी सिर पर आवश्यक सामान का बैग और बगल में बच्चा लेकर आगे की ओर बढ़ती रही।
बच्चों ने भी परिजनों का पूरा साथ दिया और गंतव्य तक जाने के लिए वह भी अपने छोटे छोटे कदमों से ऐसे बढ़ते दिखे मानो वहां जाकर साक्षात गंगा के दर्शन करने से उनका आगामी जीवन हर तरह से सुगम हो जाएगा। मेले में पहुंचे तो वहां आस्था के अलावा जिस बात ने हर संवेदनशील व्यक्ति को कचोटा, वह था वहां असमानता का बड़ा पहाड़। कहते हैं भगवान के दरबार में कोई छोटा या बड़ा नहीं, लेकिन यहां ऐसा अनुभव नहीं हुआ।
एक तरफ कुछ तंबू ऐसे लगे थे, जिनके सामने शानदार बड़ी-बड़ी कारें खड़ी थीं और अंदर न जाने क्या-क्या हो रहा था। वहीं ऐसे भी लाखों लोग थे, जिनके थैले में खाने पीने का कुछ सामान, गंगा के रेतीले मैदान में बिछाने को एक बड़ी पॉलीथिन और ओढ़ने को एक गर्म चादर भर थी। ऐसे लोगों को परेशान करने में प्रशासन तो प्रशासन ठगों ने भी परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

विभिन्न सेक्टर के बाहर कच्ची सड़क के किनारे ही छोटी सी जगह में गीले रेत और खुले आसमान के नीचे जैसे-तैसे सोने की कोशिश करते परिवारों से जहां होमगार्ड तक ने 10-20 रुपये वसूलने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वहीं बहरूपियों ने भी सोते लोगों के पैरों या पेट पर डंडे से ठोकर मारकर कुछ ना कुछ हासिल कर ही लिया। ऐसा करते हुए शायद किसी ने ये भी नहीं सोचा कि ये ही वे लोग हैं, जिनके कारण गंगा आज भी मां और उसका पानी अमृत है।
फोर्स की मुस्तैदी में गढ़मुक्तेश्वर से सकुशल लौट रहे श्रद्धालु
किठौर: मंगलवार को सुबह से ही गढ़मुक्तेश्वर कार्तिक पूर्णिमा मेले से श्रद्धालुओं ने लौटना शुरू कर दिया। जिससे मेरठ-गढ़ व हापुड़-किठौर मार्गों पर दिनभर श्रद्धालुओं के वाहन ही दौड़ते दिखे। भैंसा-बुग्गी, ट्रैक्टर-ट्रॉली व कारों में सवार श्रद्धालुओं में अपने गंतव्य पर पहले पहुंचने को लेकर होड़ सी मची थी।
एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए आड़े तिरछे कर अंधाधुंध वाहन दौड़ाए जा रहे थे। जिससे जाम और अनहोनी की आशंका बनी हुई थी, लेकिन पुलिस की सतर्कता के चलते स्थिति नियंत्रित रही। इंस्पेक्टर अरविंद मोहन शर्मा ने बताया कि मेला वाहनों के व्यवस्थित व सुचारू आवागमन के लिए 50 अतिरिक्त पुलिसकर्मी मुख्य पाइंटों तैनात किए गए हैं। श्रद्धालु शांतिपूर्वक लौट रहे हैं।

