Monday, June 15, 2026
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कौन होगा ओबीसी चेहरा, बदलेंगे राजनीतिक समीकरण

  • भाजपा इस बार ओबीसी का मजबूत चेहरा चुनाव मैदान में उतारेगी
  • भाजपा पिछले चुनाव में पराजय का कर चुकी सामना

जनवरी संवाददाता |

मेरठ: नगर निकाय चुनाव को लेकर आरक्षण घोषणा के बाद तस्वीर साफ हो गई है। कौन होगा ओबीसी चेहरा? क्या बदलेंगे राजनीतिक समीकरण? इसको लेकर हर गली-नुक्कड़ पर यही चर्चा है। भाजपा ओबीसी चेहरा किसको बनाकर चुनाव मैदान में उतारती हैं? यह बहुत कुछ तय करने वाला है। कहा जा रहा है कि भाजपा इस बार ओबीसी का मजबूत चेहरा चुनाव मैदान में उतारेगी।

क्योंकि भाजपा पिछले चुनाव में पराजय का सामना कर चुकी है। निकाय चुनाव एक तरह से आम चुनाव 2014 का सेमीफाइनल भी माना जा रहा है। क्योंकि निकाय चुनाव से निपटने के बाद प्रशासनिक सिस्टम के साथ ही राजनीतिक दलों के नेता भी लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट जाएंगे। बड़ा सवाल यह है कि आखिर भाजपा सपा और बसपा से ओबीसी चेहरा उम्मीदवार के रूप में किसको तय किया जाता है?

उस पर बहुत कुछ निर्भर रहने वाला है। इस बात को राजनीतिक एक्सपर्ट भी मानते हैं की मेयर का चुनाव पार्टी के स्तर से तो है ही, लेकिन ओबीसी चेहरे पर भी बहुत कुछ तय करेगा। महानगर में देखा जाए तो जाट बिरादरी भी बहुतायत में है। अब नगर निगम चुनाव में भाजपा जाट पर दांव लगाती है या फिर अन्य बिरादरी पर वह भी राजनीति की तस्वीर को कुछ हद तक साफ अवश्य कर देगा।

भाजपा सूत्रों का कहना है कि अति पिछड़ी जाति से भी पार्टी उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतार सकती है। क्योंकि उसका लाभ लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिलेगा। भाजपा के अलावा सपा के लिए भी यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। क्योंकि सपा ने यदि गैर मुस्लिम पिछड़ा मजबूत चेहरा चुनाव मैदान में उतारा तो चुनाव बेहद रोमांचक हो सकता है। यदि सपा किसी मुस्लिम को ओबीसी चेहरे के रूप में चुनाव मैदान में उतारती है

तो उससे भाजपा की जीत आसान हो जाएगी। रही बात बसपा की तो बसपा मुस्लिम प्रत्याशी पर ही दांव लगाएगी। ऐसा बसपा के सूत्रों का कहना है, जो सपा का राजनीतिक गणित बिगाड़ सकती हैं। बसपा ही मुस्लिमों में सेंध लगा सकती हैं। इस बात को सपा भी जानती है और अन्य दलों के नेता भी। बसपा किसी बड़े मुस्लिम चेहरे पर दांव लगा सकती हैं। हालांकि पूर्व मंत्री याकूब कुरैशी और उसका परिवार जेल में हैं।

उस परिवार की काफी प्रतिष्ठा भी खत्म हुई हैं, ऐसे में उस परिवार को शायद बसपा चुनाव मैदान में उतारे, लेकिन पूर्व एमपी शाहिद अखलाक के भाई राशिद अखलाक ने भी तब मेयर का चुनाव लड़ने का बसपा के टिकट से ऐलान किया था, लेकिन उस दौरान बसपा हाइकमान ने अपनी स्थिति इसको लेकर स्पष्ट नहीं की थी। बरहाल, ये चुनाव ओबीसी चेहरा कौन होगा? उस पर बहुत कुछ निर्भर करने वाला हैं।

भाजपा: इन दिग्गजों के नाम टॉप पर

नगर निकाय चुनाव की आरक्षण सूची जारी होने के बाद राजनीति का अचानक तापमान बढ़ गया हैं। भाजपा के जो ओबीसी नेता हैं, उनकी अचानक सक्रियता बढ़ गई हैं। भाजपा की तरफ से 150 ओबीसी नेताओं ने मेयर पद के लिए दावेदारी की थी। उन पर पार्टी विचार करती है या फिर से दावेदारों से बायोडाटा मांगा जाएगा। क्योंकि भाजपा में संगठन स्तर पर भी फेरबदल हो चुका हैं। क्षेत्रीय अध्यक्ष पद पर सत्येन्द्र सिसौदिया की ताजपोशी हो चुकी हैं।

अब मेयर पद के लिए टिकट को लेकर उनकी मुहर लगेगी। पहले मोहित बेनीवाल क्षेत्रीय अध्यक्ष थे, उनकी रिपोर्ट गई थी। अब फिर से ओबीसी चेहरे के लिए भाजपा में कवायद होगी। कई स्तर पर ओबीसी चेहरे के लिए मंथन होगा। अब कौन होगा चुनाव लड़ने के लिए उपयुक्त चेहरा, उसी का नाम पार्टी के शीर्ष नेताओं तक पहुंचाया जाएगा। भाजपा में कैंट बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष सुनील वाधवा की पत्नी बीना वाधवा का नाम टॉप पर चल रहा था। राज्यमंत्री डा. सोमेंद्र तोमर की पत्नी का नाम भी मेयर पद की उम्मीदवारी के लिए चल रहा है।

हालांकि पूर्व मेयर हरिकांत अहलुवालिया का नाम भी प्रमुखता से लिया जा रहा था, लेकिन उनकी छवि को लेकर भाजपा के कुछ नेता संतुष्ट नहीं थे। क्योंकि हरिकांत अहलुवालिया नगर निगम के मेयर रह चुके हैं। यही वजह है कि महानगर में उनका विरोध भी हैं, उनके कार्यकाल के दौरान कुछ लोग उनसे नाखुश थे, जिसको लेकर पार्टी स्तर पर बातचीत चली थी। जाट बिरादरी से डा. तनुराज सिरोही भी भाजपा का चेहरा हो सकते हैं,

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उनके नाम पर भी चर्चा हो चुकी हैं। शिक्षित और शहर के प्रतिष्ठित उनका चेहरा हैं। संदीप पहल का नाम भी भाजपा में चला था, लेकिन भाजपा शहर में मेयर पद पर जाट बिरादरी को लाना चाहती हैं, ये तभी संभव हो सकता हैं कि जाट ओबीसी चेहरे को उतारा जा सके। वैसे तो भाजपा के पास जो बायाडाटा पहले पहुंचे थे, उसमें लंबी फेहरिस्त हैं।

सपा: कई दिग्गज टिकट पाने की कतार में

सपा में ओबीसी नेताओं के आरक्षण घोषित होने के बाद बांछें खिल गई। हालांकि सामान्य जाति के नेताओं को इस आरक्षण ने निराश भी कर दिया। सपा में कई दिग्गज पार्टी हाईकमान से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं, इनमें सरधना से सपा विधायक अतुल प्रधान की पत्नी सीमा प्रधान भी शामिल हैं। सीमा जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। गैर मुस्लिम गुर्जर चेहरा होने के कारण भी वह अपनी मजबूत दावेदारी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने कर रहे हैं।

सीमा प्रधान को सपा चुनाव में मैदान में उतारती हैं या फिर किसी अन्य ओबीसी चेहरे को, यह तो अभी स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन सपा नेताओं ने जोड़तोड़ आरंभ कर दिया हैं। सपा के शहर विधायक रफीक अंसारी भी अपनी पत्नी के लिए मेयर के टिकट की दावेदारी की जा रही हैं, लेकिन सपा सूत्रों का कहना है कि मेयर पद पर सपा गैर मुस्लिम चेहरा देने के पक्ष में हैं। अब इसमें कौन प्रत्याशी होगा, अभी यह कहना मुश्किल हैं।

हरीशपाल के परिवार से भी मेयर के टिकट की दावेदारी की जा रही हैं। पूर्व सांसद हरीपाल की पुत्रवधू के सांसद डिम्पल यादव से भी करीबी रिश्ते हैं, जिसके चलते उनको भी मजबूत प्रत्याशी माना जा रहा हैं। सपा में वैसे तो करीब पचास से ज्यादा दावेदारों ने आवेदन पार्टी के सामने पिछले दिनों किये थे, लेकिन अब देखना ये है कि जिताऊ ओबीसी चेहरा कौन हो सकता हैं, जिसको लेकर पार्टी हाईकमान उसके नाम पर ही फाइनल मुहर लगाएगी। अब यह भी कहना मुश्किल होगा कि ये सीट सपा पर रहेगी या फिर रालोद पर जाएंगी।

क्योंकि सपा-रालोद का गठबंधन हैं। रालोद के नेता डा. राजकुमार सांगवान, पूर्व विधायक चन्द्रवीर की पुत्री मनीषा अहलावत भी मेयर के लिए दावेदारी ठोक रही हैं। रालोद के अन्य नेता भी इस पद के लिए दावेदारी कर रहे हैं। अब देखना ये है कि सपा-रालोद के बीच गठबंधन धर्म के अनुसार मेरठ की मेयर सीट किसके खाते में जाती हैं। इसके बाद ही राजनीतिक समीकरणों की कुछ बात की जा सकती हैं।

धरी रह गर्इं तैयारियां, उम्मीदों पर फिरा पानी

स्थानीय निकाय चुनावों में ताल ठोंकने के लिए तैयार बैठे कई धुरंधरों की उम्मीदों को गहरा धक्का लगा है। मेरठ महापौर की सीट पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित होने के चलते कई स्थानीय कांग्रेसियों की तैयारियां धरी की धरी रह गई हैं। इन कांग्रेसियों की उम्मीदों और अरमानों पर पानी फिर गया है। कांग्रेस में वैसे तो महापौर पद के लिए मजबूत उम्मीदवारों का टोटा था लेकिन फिर भी पिछड़ा वर्ग से अलग कई कांग्रेसी ताल ठोंकने को तैयार बैठे थे।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार इनमें समाजवादी पार्टी से आए सरदार परविन्द्र सिंह ईशू काफी सक्रिय थे और महापौर का टिकट पाने के लिए काफी भागदौड़ कर रहे थे। उनकी उम्मीदों पर कुठाराघात हुआ है। सीट पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित होने के बाद उन्होंने कहा कि भले ही यह निराश करने वाला समाचार है लेकिन वो भविष्य में भी साफ सुथरी राजनीति करते रहेंगे। इसके अलावा पार्टी में अपर कास्ट के कई अन्य धुरंधर भी महापौर के टिकट की लालसा रखते थे। सीट पिछड़ा वर्ग में जाने से इन सभी की उम्मीदों पर कुठाराघात हुआ है।

सभी के चेहेरे लटके हुए हैं। पार्टी में परविन्द्र ईशु के अलावा रंजन शर्मा भी टिकट के लिए प्रमुख दावेदारों की पंक्ति में थे। उन्हें भी निराशा हाथ लगी है। इसके अलावा पूर्व पार्षद अनिल शर्मा, सतीश शर्मा, ओपी शर्मा एडवोकेट एवं ठा. सुरेन्द्र सिंह भी लाइन में थे। उधर, कुछ कांग्रेसियों का मानना है कि मेरठ की सीट पिछड़ा वर्ग में जाने के बाद हो सकता है कि बसपा या किसी दूसरी पार्टी से पिछड़ी जाति का कोई दमदार नाम कांगे्रेस ज्वॉइन कर महापौर पद के लिए आवेदन कर सकता है। कुल मिलाकर कांग्रेस के कई नेताओं में निराशा का माहौल है।

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