
पूंजीवाद की जय और साम्यवाद की पराजय के उद्घोष के इस दौर में वैज्ञानिक समाजवाद के प्रणेता दार्शनिक, अर्थशास्त्री, समाजविज्ञानी और पत्रकार कार्ल मार्क्स (1818 में जिनका जर्मनी में आज के ही दिन जन्म हुआ) की यादें एक बड़ी विडम्बना की शिकार हैं। यह कि आम तौर पर उन्हें याद करना जरूरी नहीं समझा जाता, लेकिन भुलाना भी संभव नहीं हो पाता। इसलिए कार्ल मार्क्स हैं कि बरबस याद आते रहते हैं-प्राय: सताने की तर्ज पर। उन्हें भी जो उनके अनुयायी होने का दावा करते हैं और उन्हें भी जो उनसे परहेज बरतना चाहते और परहेज से ज्यादा ‘दुश्मनी’ पर आमादा रहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो कार्ल मार्क्स के अनुयायियों की परेशानी यह है कि वे उन्हें ‘स्थापित’ नहीं कर पाए हैं तो ‘दुश्मनी’ पर आमादा रहने वालों की यह कि उन्होंने भले ही उनके विचारों का दुर्दिन सें सामना करा दिया है, उनको पूरी तरह खारिज या ‘विस्थापित’ नहीं कर पा रहे।