Friday, May 1, 2026
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बच्चों की सामान्य शरारतें उनके व्यक्तित्व विकास में सहायक 

BALWANI


समाज में बच्चों की शरारतों को प्राय: अभिवावकों द्वारा या अन्य लोगों द्वारा आसानी से एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता। कई बार देखा गया है कि कुछ बच्चे कक्षा में शिक्षक की उपस्थिति में या घर पर अभिवावक की उपस्थिति में कोई शरारत नहीं करते, कक्षा में शिक्षक और घर पर अभिवावक की अनुपस्थिति में खूब शरारतें करते हैं।

ऐसी स्थिति में  उसके शिक्षक और अभिवावक स्वीकार ही नहीं कर पाते कि उनका बच्चा इस तरह की शरारतें भी कर सकता है। शरारती बच्चे अक्सर बड़ों की सलाह नहीं मानते, वे हर चीज खुद करके देखना चाहते हैं। ये व्यवहार उनके स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होकर किसी काम को करने के गुण को दशार्ता है।

आप उन्हें छोटे-मोटे काम खुद से करने दें, वे अपनी ही गलतियों से बेहतर सीखेंगे। अगर आप एक आत्मनिर्भर बच्चे को बड़ा करना चाहते हैं, तो अब से जब शरारती बच्चे आपकी बात न मानें और खुद ही कोई निर्णय लें तो आप उन्हें डांटें नहीं, बल्कि उनकी प्रशंसा करें और उनका साथ दें।

शरारती बच्चे अक्सर एक जगह स्थिर नहीं बैठ पाते हैं। ये बहुत ऊर्जावान होते हैं। जब वे घर में हों तो कुछ न कुछ गतिविधि करेंगे ही या वे बाहर खेलने चले जाएंगे, लेकिन स्थिर और शांत होकर कम ही बैठेंगे। उनका यह व्यवहार दूसरों को परेशान कर सकता है, लेकिन यह उनका दुनिया को जानने-समझने का अपना तरीका है, उन्हें खाली बैठना पसंद नहीं है।

इन बच्चों में कुछ हद तक जोखिम लेने का गुण होता है। ऐसे में उन पर गुस्सा होने और डांटने के बजाय आप उनकी ऊर्जा को उनकी पसंदीदा हॉबी क्लासेज के माध्यम से रचनात्मक कार्यों की ओर मोड़ सकते है जो बच्चे के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

जब शरारती बच्चे बाहर खेलकर गंदे होकर घर आते या कुछ देर से आते हैं तब आपको उन पर गुस्सा करने की बजाय उन्हें प्यार से समझाना चाहिए और उनमें छुपे हुए जिज्ञासु और रचनात्मक गुण को समझना चाहिए। क्या बच बिना कोई गड़बड़ या गलती किए कभी कोई  एक महान कलाकार, वैज्ञानिक या खिलाड़ी बन सका है?

बच्चे की शरारतें उसके एक विशेष मनोवैज्ञानिक स्थिति को व्यक्त करने के लिए काफी है। बच्चों द्वारा शरारत किया जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। या इसे आप कह सकते हैं कि बच्चे की अपने चारों ओर उपस्थित वस्तुओं के विषय में उत्पन्न होने वाली जिज्ञासा का उत्तर पाने के लिए किए जाना वाला प्रयास है जो हमारी या आपकी नजर में एक शरारत या फिर अनुशासनहीनता हो सकती है पर बच्चे के लिहाज से एक सामान्य क्रिया है।

जो बच्चे के मानसिक, संवेगात्मक और भावात्मक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अब प्रश्न उठता है कि बच्चा घर से  बाहर निकलकर शरारतें ज्यादा क्यों करता है ? या फिर कक्षा में अध्यापक की उपस्थिति में कम शरारतें और अध्यापक की अनुपस्थिति में ज्यादा अनुशासनहीनता क्यों दिखाता है?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही है जब बच्चे की मन मस्तिष्क की जिज्ञासाओं का समाधान  माता पिता  या शिक्षक की उपस्थिति नहीं हो पाता, तब बच्चा उनका समाधान बाहर अकेले में, या फिर कुछ मित्रों के साथ होने पर स्वयं करके अपनी जिज्ञासा को शांत करता है।

अर्थात यदि अभिवावक या शिक्षक बच्चे को एक मशीन न मानते हुए, अपनी उपस्थिति में कुछ शरारत या अनुशासनहीन करने की छूट दे दें तो शायद घर से बाहर होने पर  बच्चा उस अनुशासनहीनता या शरारतों को नहीं दोहराएगा। जबकि होता बिल्कुल विपरीत है घर में मां या पिता या फिर दोनों की सख्ती की वजह से बच्चा अपने आप को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाता, यही स्थिति शिक्षक की उपस्थिति में होती है।

बच्चा धीरे धीरे किशोर अवस्था की ओर बढ़ रहा होता है। वो अपने चारों ओर के संसार को जानना चाहता है। उसके मस्तिष्क में हर मिनट सैंकड़ों प्रश्न जन्म ले रहे होते है। कुछ का उत्तर मिलता है कुछ अनुत्तर ही रह जाते है। जो बच्चे के मस्तिष्क को उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करता है और उसी प्रेरणा के वशीभूत हो त्रुटियां हो जाना भी स्वाभाविक है, जिसे शरारतों का नाम दे दिया जाता है।

बच्चे के संपूर्ण, स्वाभाविक विकास के लिए आवश्यक है कि अभिवावक और अध्यापक अपनी उस्थिति में भी  बच्चों को कुछ शरारत करने की छूट प्रदान करें ताकि बच्चा स्वयं करने के जोखिम से बचा रहकर अपने वातावरण को जान सके। बच्चों को घर में माता पिता या विद्यालय में शिक्षक की उपस्थिति में शरारतों या कुछ अनुशासनहीनता द्वारा भी बहुत कुछ सिखाया जा सकता है।

बच्चे के प्रति सख्त होने की बजाय विनम्र होने की आवश्यकता है। उसे भयभीत करने की बजाय प्रोत्साहन की अधिक आवश्यकता होती है। उसे गलत या सही का भेद समझाने की आवश्यकता है।

अगली बार जब आपका बच्चा शरारत करे तो उसे डांटने या धमकाने के स्थान पर उसकी शरारतों का  पर्यवेक्षण कीजिए और उसके आधार पर उसमे सुधार लाने का प्रयास कीजिए।बच्चा स्वयं ही अनुशासित हो जायेगा।लेकिन अगर आपका बच्चा हद से ज्यादा शरारती है, जिससे कि दूसरों को नुकसान पहुंच सकता है, ऐसे में काउंसलर की सलाह लेना अनिवार्य हो जाता है।

राजेंद्र कुमार शर्मा


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