Saturday, April 11, 2026
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आस्था का केंद्र है, प्राचीन पांडेश्वर महादेव मंदिर

  • 16 सोमवार पूजा-अर्चना से होती है मनोकामना पूर्ण
  • धर्मराज युधिष्ठिर ने युद्ध से पूर्व की थी मंदिर की स्थापना

जनवाणी संवाददाता |

हस्तिनापुर: जनपद के हस्तिनापुर कस्बे में स्थित प्राचीन महाभारत कालीन प्राचीन पांडेश्वर महादेव मंदिर आज भी लोगों की मनोकामनाओं को पूरी कर रहा है। पांडेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर के हाथों युद्ध से पूर्व की गई थी। मान्यता यह है कि यहां मंदिर के समीप से होकर गुजरने वाली गंगा नदी में कुरुक्षेत्र में हुए युद्ध से पूर्व पांडव स्नान कर भगवान भोलेनाथ की आराधना किया करता थे।

धर्मराज द्वारा निर्मित इस मंदिर में भोलेनाथ का शिवलिंग है। पांडव पुत्र द्रौपदी के साथ रोजाना महादेव की पूजा-अर्चना करते थे। तभी से यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर की स्थापना गंगा नदी किनारे होने के चलते इसकी मान्यता और भी अधिक हो जाती है। महाशिवरात्रि और सावन माह में दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर महादेव का आशीर्वाद लेते हैं।

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इतिहासकारों के अनुसार जिले का हस्तिनापुर कस्बा महाभारतकालीन समय में विराट नगरी के रूप में जाना जाता था। दुर्याेधन से जुएं में हारने के बाद पांचों पांडव द्रौपदी के साथ 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास में निकल गए थे। अज्ञातवास के समय पाडव पुत्र अर्जुन ने धनुष झील किनारे स्थित पेड़ों पर छुपा दिया था। हस्तिनापुर के समीप से ही प्राचीन समय में गंगा नदी बहती थी।

प्रशासन की उपेक्षा के चलते आज प्राचीन गंगा नदी विलुप्त होती नजर आ ही। प्राचीन काल में गंगा नदी के बहने के चलते ही धर्मराज युधिष्ठिर ने महाभारत के युद्ध से पूर्व स्वंय प्राचीन पांडेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की थी। जिसके चलते इस मंदिर की मान्यता और भी अधिक हो जाती है।

मंदिर को झेलनी पड़ी उपेक्षा

मंदिर के पास स्थित झीलों को पूर्व काल में गंगा नदी कहा जाता था। पांडवों ने युद्ध से पूर्व गंगा किनारे मंदिर की स्थापान की। चूने की बड़ी-बड़ी दीवारों के बने इस मंदिर को भी मुगल सम्राज्य का प्रकोप झेलना पड़ा था। मुगलों ने मंदिर का खंडित कर लोगों के प्रवेश पर लोग लगा दी थी, लेकिन शिवलिंग को कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाए। जिसके बाद 18वीं शताब्दी में राजा नैनसिंह द्वारा इस मंदिर का जीणोद्धार कराया गया। आज यह हजारों लोगों की आस्था का केंद्र है।

मंदिर के चारों तरफ स्थित है गुंबद

धर्मराज युधिष्ठिर के हाथो स्थापित मंदिर के चारों और गुंबद बने हैं। इतिहासकारों की माने तो मंदिर के चारों और स्थित गुंबदों भी अपने आपमें एक विरासत समेटें है। कहा जाता है कि गंगा नदी में स्नान के बाद जब धर्मराज युधिष्ठिर भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करते थे

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तो उनके चारों भाई भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव मंदिर की चारों दिशाओं में स्थित गुंबदों से भोलेनाथ की आराधना करते हैं। आज भी मान्यता है कि जो व्यक्ति मंदिर में स्थित शिवलिंग की पूजा-अर्चना के समय गुंबदों से भोलेनाथ की आराधना करते हैं। उनकी मनोकामना पूर्ण होती है।

सावन महीने और महाशिवरात्रि को लगता है भक्तों का तांता

मंदिर के पुजारी की मानें तो सावन महीने और महाशिवरात्रि पर पांडेश्वर महादेव के शिवलिंग का शृंगार मंदिर की तरह होता है। मंदिर में इस समय हर समय श्रद्धालु दर्शन को पहुंचते हैं। यहां की सबसे बड़ी मान्यता यह है कि यहां अगर कोई सच्चे मन से शिवलिंग में 16 सोमवार 11 बेल पत्र अर्पित करता है

तो बाबा भोलेनाथ उसकी हर मुराद पूरी करते हैं। प्राचीन काल की झीलें अब गायब हो चुकी हैं। झीलों के नाम पर अब केवल नाले ही बचे हैं। लोग आज भी नालों में तब्दील हो चुकी गंगा नदी में स्नान कर भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं और पांडवों की कुलदेवी के मंदिर में भी पूजा-अर्चना करते हैं।

पांडेश्वर महादेव मंदिर का क्या है इतिहास?

जहां इतिहासकार धर्मग्रंथों के अनुसार प्राचीन पांडेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना धर्मराज युधिष्ठिर के हाथों मानते हैं। वहीं, महज 100 कदमों की दूरी पर पांडवों की कुल देवी जयंती माता के मंदिर का होना भी इस बात की पुष्टि करता है। इतिहासकार बताते है कि कुलदेवी के से महाभारत के युद्ध में जीत का वरदान मिलने से पूर्व ही पांडवों ने कुलदेवी के आशीर्वाद से प्राचीन पाडेश्वर मंदिर की स्थापना की थी।

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