- समय धीरे-धीरे परिवर्तित हुआ और लोगों का रुझान एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति की ओर बढ़ा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: प्राचीन समय में किसी भी बीमारी या चोट को ठीक करने के लिये जड़ी बूटियों का प्रयोग किया जाता था। यहां तक कि रामायण में भी हनुमान ने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण को जीवित किया था। समय धीरे-धीरे परिवर्तित हुआ और समय के साथ लोगों का रुझान एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति की ओर बढ़ा। जिस कारण से आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धति कहीं पीछे छूटते चले गए।
मगर साल 2019 की कोरोना महामारी ने एक बार फिर से वह दौर वापस ला दिया। जिसमें लोग दोबारा आयुर्वेदिक और यूनानी दवाइयों की ओर लौट गए। इस समय इम्युनिटी पॉवर बनाए रखने के लिये न एलोपैथी काम आयी और न ही होम्योपैथी। लोगों ने इस दौरान प्रत्येक भारतीय रसोई में मिलने वाली अदरक, अर्जुन की छाल, तुलसी, मुलेठी, अश्वगंधा, जीवंती जाला, गिलोय, काली मिर्च जैसी औषधीय गुण रखने वाले खाद्य सामग्री का प्रयोग करके अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई।

आयुर्वेदिक चिकित्सा की तरह यूनानी चिकित्सा भी प्राकृतिक चिकित्सा ही है। यूनानी चिकित्सा की उत्पति हिपोक्रिटस और ग्रीक दार्शनिकों गैलन और रेज की शिक्षाओं के आधार पर हुई थी। इसलिए इसे ग्रिको-अरब चिकित्सा भी कहा जाता है। आयुष्मान द्वारा चिकित्सा अनुसन्धान यूनिट (यूनानी मेडिसिन) के प्रभारी डा. मौहम्मद तारीख खान बताते हैं कि यहां रोज 200 मरीजों का इलाज किया जाता है। जिसमें मरीज की मात्र 20 रुपये की पर्ची काटी जाती है और एक हफ्ते की नि:शुल्क दवाइयां दी जाती है।
सीनियर सिटीजन ओपीडी की सुविधा
तारीख खान बताते है कि चिकित्सा अनुसंधान यूनिट द्वारा हर सोमवार को सीनियर सिटीजन के लिए ओपीडी लगती है। जिसकी पर्ची मात्र आठ रुपये में बनती है, इसके उपरांत परामर्श के बाद उनको सात दिन की निशुल्क दवाइयां मुहैया कराई जाती है। साथ ही जनरल ओपीडी भी लगवाई जाती है। जिसकी पर्ची मात्र 20 रुपये में काटी जाती है।
गांव में नि:शुल्क मोबाइल वैन सुविधा
सोमवार से लेकर शुक्रवार तक चिकित्सा अनुसंधान यूनिट द्वारा निशुल्क मोबाइल वैन लगाई जाती है, जोकि जिले के आसपास के गांवों में घूमती है तथा लोगों का इलाज करती है। यह वैन सोमवार को फिटकरी, मंगलवार को बिजौली, बुधवार को खंडोडा, गुरुवार व शुक्रवार को हसनपुर करीम में नि:शुक दवाइयों का वितरण करती है।
साल में दो बार आती है दवाइयां
यह जड़ी-बूटियां दिल्ली के खारी बावली से आती है, जो भारत में जड़ी-बूटियों के मामले में सबसे बड़ा बाजार है। साल में दो बार ये दवाइयां आती है।
आसपास के जिलों और गांवों में मरीज
जनवाणी टीम बुधवार को जब कैंटोनमेंट चिकित्सालय पहुंची तो वहां भारी मात्रा में मरीज मिले। यहां आसपास के गांवों जैसे खरखौदा, जानी, फफंूडा, लोहिया, दौराला, मवाना आदि से मरीज आते हैं। बड़े मवाना से सरला बताती है कि उनको सांस लेने में दिक्कत है, वो यहां से दूसरी बार दवाई ले रही है।
वह बताती है कि यहां की दवाइयां असरदार है और उनको यहां की दवाई से ही आराम मिलता है। मोहननगर से सरवरी बताती है कि वह दो साल से यहीं से दवाई ले रही है। यहां समय तो लगता है, लेकिन दवाई फायदा करती है और दवाइयों का कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। साथ ही बहुत ही कम रुपये में दवाइयां उपलब्ध है।

