Tuesday, March 3, 2026
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दवा खाकर पीरियड्स रोकने से बचे आधी आबादी

स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में मासिक धर्म स्वास्थ्य शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, ताकि किशोरावस्था से ही लड़कियां समझ सकें कि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसे रोकने के लिए दवा खाना शरीर के लिए कितना हानिकारक हो सकता है।

डॉ. नीलू तिवारी

हाल ही में एक 18 वर्षीय छात्रा की मौत की घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया, जिसने धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पीरियड्स रोकने की दवा खा ली थी। यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि एक गहरी चेतावनी है कि मासिक धर्म को रोकने या बदलने वाली दवाएं कितनी घातक हो सकती हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या थोड़ी सुविधा या सामाजिक दबाव महिला की जान से अधिक महत्वपूर्ण है? यह विषय आज न केवल स्वास्थ्य के लिहाज से, बल्कि सामाजिक सोच और सरकारी नीतियों की दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक हो गया है।

बेंगलूरु में घटी इस दर्दनाक घटना ने समाज का ध्यान खींचा है, जहां छात्रा ने धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अपने मासिक धर्म को रोकने की गोलियां खाईं। लगातार तीन दिन तक दवा खाने के बाद अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई। उसे पैरों में सूजन, तेज दर्द और फिर सांस लेने में तकलीफ हुई। जब तक परिवार वाले उसे अस्पताल लेकर पहुंचे, डॉक्टरों ने पाया कि उसकी नसों में खून का थक्का जम चुका है। गहन उपचार के बावजूद छात्रा की मौत हो गई। इस घटना ने सभी को झकझोर दिया और यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर क्यों महिलाएं बिना सोचे-समझे या बिना चिकित्सकीय सलाह के ऐसी खतरनाक दवाओं का सेवन करती हैं।

असल में यह केवल एक महिला के व्यक्तिगत स्वास्थ्य से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और सरकारी नीतियों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से देखें तो इन हार्मोनल दवाओं का गलत या बिना डॉक्टर की सलाह के सेवन करना बेहद खतरनाक है, क्योंकि इससे हार्मोनल असंतुलन, रक्त के थक्के, गर्भधारण में कठिनाई और यहां तक कि मौत जैसी स्थिति तक हो सकती है। महिलाओं के जीवन में मासिक धर्म एक प्राकृतिक और सामान्य प्रक्रिया है। यह न केवल उनके स्वास्थ्य का संकेत है, बल्कि शरीर की प्राकृतिक लय का हिस्सा भी है।

सामाजिक दृष्टि से भारत जैसे देशों में अब भी धार्मिक अवसरों, शादी-ब्याह और परीक्षाओं के दौरान महिलाओं पर मासिक धर्म रोकने का दबाव डाला जाता है। यह दबाव उन्हें मजबूरी में दवा खाने पर मजबूर करता है। आर्थिक दृष्टि से यह दवाएं महंगी हैं और कमजोर वर्ग की महिलाएं इन्हें खरीद नहीं पातीं। कई बार सस्ती नकली दवाएं खाकर और बड़े खतरे मोल ले लेती हैं। कानूनी और नीतिगत स्तर पर भी इन दवाओं की बिना पर्ची बिक्री आम है। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से देखें तो इन हार्मोनल दवाओं का गलत या बिना डॉक्टर की सलाह के सेवन करना बेहद खतरनाक है, क्योंकि इससे कई दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।

चिकित्सकों के अनुसार, पीरियड्स रोकने वाली गोलियां सामान्य दर्द निवारक या सर्दी-जुकाम की दवा नहीं होतीं। इन दवाओं का अत्यधिक सेवन महिलाओं के शरीर में गंभीर बदलाव ला सकता है। इससे मोटापा बढ़ना, मुंहासे होना, चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल उगना, लगातार थकान रहना, मूड स्विंग और अवसाद जैसी मानसिक समस्याएं हो सकती हैं। कुछ मामलों में महिलाओं में गर्भधारण की क्षमता प्रभावित होती है और प्रजनन संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। लंबे समय तक लगातार इन दवाओं का सेवन करना दिल और लिवर से जुड़ी बीमारियों का कारण भी बन सकता है।

बेंगलूरु की इस घटना ने यह भी उजागर किया है कि हमारे समाज में मासिक धर्म से जुड़ी झिझक और दबाव अभी भी बहुत गहरे हैं। धार्मिक अवसरों, शादी-ब्याह या सामाजिक आयोजनों में लड़कियां और महिलाएं यह सोचकर दवा खा लेती हैं कि पीरियड्स को टालना आसान उपाय है। शुरूआत में यह उपाय आसान और प्रभावी लगता है, लेकिन लंबे समय में यह शरीर पर गंभीर हानिकारक प्रभाव डाल सकता है। ग्रामीण और कम शिक्षित महिलाएं अक्सर बिना डॉक्टर की सलाह के दवा ले लेती हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य और बिगड़ जाता है। कई बार उन्हें तुरंत राहत तो मिलती है, लेकिन बाद में यह निर्णय गंभीर बीमारी की जड़ बन सकता है।

दूसरा सवाल यह भी है कि नकली और सस्ती दवाइयों का सेवन स्वास्थ्य को गहरी चोट पहुंचाता है, लेकिन यह आसान उपाय जीवन का सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक मासिक चक्र में हस्तक्षेप करने की बजाय इसे सामान्य रूप से स्वीकार करना चाहिए। यदि कभी जरूरी परिस्थिति आ भी जाए, तो पहले डॉक्टर की सलाह लेना अनिवार्य है। हमें यह समझना जरूरी है कि मासिक धर्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसे रोकने या बदलने की कोशिश शरीर की प्राकृतिक घड़ी के साथ खिलवाड़ है। अगर किसी महिला को पीरियड्स में असामान्य दर्द, अधिक रक्तस्राव या बार-बार पीरियड्स अनियमित होने जैसी समस्या है, तो उन्हें तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।

सही इलाज और डॉक्टर की सलाह के बिना दवाइयों का सेवन करना सबसे बड़ा खतरा है। महिलाओं को जागरूक होना चाहिए कि पीरियड्स को रोकने या बदलने के लिए दवा खाना केवल अस्थायी राहत है, लेकिन इसका दीर्घकालिक असर बेहद हानिकारक है। सुरक्षित और स्वस्थ जीवन के लिए बेहतर होगा कि महिलाएं अपने मासिक धर्म को प्राकृतिक रूप से स्वीकार करें और केवल आपात स्थिति में, वह भी डॉक्टर की सलाह पर ही दवा लें। अब बात करते हैं समाधान की। जागरुकता अभियान इस समस्या के समाधान का सबसे अहम हिस्सा है। मासिक धर्म रोकने वाली दवाओं के दुष्प्रभावों के बारे में आज भी महिलाओं और युवतियों को पर्याप्त जानकारी नहीं है। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में मासिक धर्म स्वास्थ्य शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, ताकि किशोरावस्था से ही लड़कियां समझ सकें कि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसे रोकने के लिए दवा खाना शरीर के लिए कितना हानिकारक हो सकता है।

वहीं सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों को टीवी, रेडियो, सोशल मीडिया और ग्रामीण क्षेत्रों में नुक्कड़ नाटक या कार्यशालाओं के माध्यम से जन-जागरुकता अभियान चलाने चाहिए। इन अभियानों का उद्देश्य केवल खतरे बताना ही नहीं, बल्कि सुरक्षित विकल्पों जैसे सैनिटरी नैपकिन, मेंस्ट्रुअल कप और स्वस्थ जीवनशैली की जानकारी देना भी होना चाहिए। साथ ही धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में महिलाओं पर दबाव कम करने और परिवारों को संवेदनशील बनाने के लिए समाज-आधारित अभियान भी जरूरी हैं। यदि जागरुकता सही तरीके से फैलाई जाए, तो महिलाएं बिना डॉक्टर की सलाह के दवा खाने से बचेंगी और अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना सीखेंगी। महिलाओं को इस बात को समझना ही होगा और सच को स्वीकार करना होगा। तभी वह अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रह पाएंगी। इसी में देश और समाज का भी भला है।

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