Tuesday, June 16, 2026
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कड़ी निंदा कर्म से भी ज्यादा महत्वपूर्ण

निंदा करना बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है। इसके अपने माप दंड हैं। निंदा मापदंडों के अनुसार की जानी चाहिए। निंदा कब करनी है, किसकी करनी है, कहां करनी, क्यों करनी है, यह निंदित व्यक्ति की कामयाबी पर निर्भर करती है। निंदा एक गुणवत्तापूर्ण और बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य है। निंदा करना हर कोई नहीं जानता। निंदा करते स्वयं हास्य के पात्र बन जाना, निंदा की सबसे घटियापन होता है। निंदा की भाषा साहित्य की भाषा से अलग होती है। साहित्य की भाषा जहां गूढ़ होती है और वैसा निंदा करने में नहीं होता है। निंदा उन्हीं के बीच की जाती है जो संदर्भ जानते हैं। आप निंदा में कितने निपुण हैं, यह निंदा की गुणवत्ता तय करती है।

निंदा निस्वार्थ नहीं की जाती। दूसरे को अपना बनाने और उसका भला करने के भ्रम के लिए की जाती है। निंदा के समय आस पास के वातावरण का ध्यान रखना जरूरी होता है। दीवारों के भी कान होते हैं, इसका पूरा ध्यान रखा जाता है। जिसकी निंदा की जाती है वह निंदा करने वाले का सगा होता है। निंदा सुनने वाला भी यही समझता है। निंदा का सर्वमान्य सत्य है-असत्य होकर भी सत्य की परिभाषा में आती है। निंदा की बड़ी बहन चुगली होती है। निंदा का असर माकूल न हो तो चुगली की जाती है। चुगली से बड़ी कोई चुगली नहीं होती, लेकिन निंदा से बड़ी कड़ी निंदा होती है। निंदा और कड़ी निंदा में फर्क है-निंदा पारिवारिक मान जाती है, मुहल्ले की मानी जाती है, रिश्तेदारों तक सीमित रहती है, जबकि कड़ी निंदा का क्षेत्र व्यापक (अंतर्राष्ट्रीय) होता है।

कड़ी निंदा तब की जाती है, जब हमारे बस में कुछ नहीं होता। चुप हम रह नहीं सकते, क्योंकि वह भी बस से बाहर होता है। कड़ी निंदा किसकी करनी चाहिए, किसकी नहीं, यह विचारणीय प्रश्न है। कड़ी निंदा अक्सर आतंकी हमलों की जाती है। अब जैसे दिल्ली आतंकी घटना या हमला हुआ उसकी कड़ी निंदा की जाए या नहीं की जाए? कुछ लोग कड़ी निंदा कर रहे हैं, कुछ लोगों के मुंह में माइक डालने के बाद भी शब्द नहीं निकल रहे हैं। जिस प्रकार निंदा स्व स्वार्थ के लिए की जाती है, कड़ी निंदा नहीं करना स्वार्थ के घेरे में आता है। निंदा और कड़ी निंदा का सबसे बढिया मौसम देसी चुनाव का होता है। देसी चुनाव में कट्टे के प्रयोग पर कड़ी निंदा की जाती है, कट्टे पर निंदा करना उचित है या नहीं लेकिन चुनाव में कट्टा लेकर चलना उचित है। कट्टा हो या लट्ठ सभी का कड़ी निंदा से कोई लेना देना नहीं। चुनाव या तो इनके बल पर होता है या फिर इनके बिना भी चुनाव सम्पन्न हो जाता है।

पहले निंदा का महत्व हुआ करता था, लेकिन अब कड़ी निंदा ने स्थान ले लिया है। कड़ी निंदा करते समय सावधानी बरती जाती है। सावधानी हटी और कड़ी निंदा का लाभ खिसका। निंदा हमेशा लाभदायक नहीं होती, लेकिन कड़ी निंदा हमेशा लाभ के लिए की जाती है। सर्वश्रेष्ठ कड़ी निंदा उसे कहा जाता है, जिससे आम जनता की सहानुभूति मिले, घटना की जांच नहीं करनी पड़े, घटना का माकूल जवाब नहीं देना पड़े। एक बार कड़ी निंदा करने के बाद इतिश्री हो जाती है। इस कड़ी निंदा से अकर्मण्यता पर परदा पड़ जाता है।

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