चतुर सुजान कहा करते है कि हां में हां मिलाने का अपना एक अलग ही मजा है। मजा क्या है कि ऐसे में आदमी के दिल और दिमाग पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता। आदमी हर समय आनंद में डूबा रहकर एकदम उन्मुक्त रहा करता है और मानसिक तनाव से भी कोसों दूर रहा करता है। इसके विपरीत किसी की हां में ना करने के आजकल के दौर में खतरे बहुत हैं। बैठे-बैठाए किसी से अंतहीन बहस का सिलसिला प्रारंभ हो सकता है। जिसके चलते व्यर्थ ही एनर्जी स्वाहा हुई जाती है। हम जिस काम को बहुत आसानी के साथ कर दिया करते थे वह भी दुष्कर हो जाता है।
वैसे भी आजकल के दौर में महंगाई और भ्रष्टाचार का संताप ही कुछ इतना है कि आदमी तो एकदम टूट कर रह जाया करता है। ऐसे में व्यर्थ का संताप तो आदमी को एकदम से तोड़कर भी रख देता है। अपना तो बस एक ही फलसफा है कि इनकी भी जय-जय और उनकी भी जय-जय। ऐसा करने पर जीतने वाले को हम अपने पाले में मान सकते हैं। इसका प्रत्यक्ष परिणाम यह होता है कि हमारे पास हर विषय एवं हर क्षेत्र के तुरुप के इक्के एकत्रित हो जाते हैं। जो वक्त जरूरत हमारे बहुत काम के सिद्ध हुआ करते हैं।
चतुर सुजान यह भी कहते हैं कि गांधी जी के तीन बंदरों से हमें सीख लेने की आवश्यकता है। किसी ने गलत कहा है तो अपना मुंह मत खोलो। किसी ने जो कुछ कहा है तो इधर सुनो और उधर निकाल फेंको। दुनिया को देखना पड़ता है, इसलिए देखो, लेकिन एकदम निस्पृह भाव से। जो कुछ देखा, उसे अपने दिल पर मत लो। अन्यथा दिल की बीमारी का इलाज बहुत महंगा पड़ता है। इसलिए बेहतर यही है कि तीनों बंदरों के अनुयायी बनकर रहो। नहीं तो आगे जाकर एक समय ऐसा भी आता है कि दूसरों की तो फिर भी छोड़ो अपने वाले तक अपने से कन्नी काट लिया करते हैं।
अब राजनीति को ही देखो, भैया की हां में हां करने के चलते जाने कितने छोटे-छोटे भैया स्वयं बड़े भैया बन गए। अलग-अलग स्तर के भैया अलग-अलग स्तर का पराक्रम करते दिखाई देते हैं। हर छोटा भैया बड़े भैया के साथ हां मैं हां और ना में ना का ही व्यवहार करते पाए गए हैं। कल्पना कीजिए यदि राजनीति में बड़े भैया की हां में कोई ना का टेका लगा देवे, तो राजनीतिक कैरियर के ही नष्ट होने का खतरा बढ़ जाया करता है। इस संबंध में चतुर सुजान इस बात पर जोर दिया करते हैं कि राजनीति में हवा के रुख की ओर बहाव होना चाहिए। राजनीतिक तरक्की का यही एक एकल मार्ग है।
दरअसल राजनीति का उक्त सिद्धांत आदमी को अपनी ‘व्यक्तिगत राजनीति’ में आत्मसात कर लेना चाहिए। क्योंकि राजनीति की भांति आपकी हमारी व्यावहारिक जिंदगी में भी यही सब कुछ होता आया है। इसलिए बेहतर यही है कि हम ऐसा खेल खेले कि हां मैं हां और ना में ना करते रहें। इसके चलते और कुछ नहीं तो हमारा कभी अहित तो हो ही नहीं सकेगा। यही नहीं अपितु हमारे दोनों हाथों में लडडू भी रह सकेगा।

