Saturday, April 25, 2026
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बंगाल में राजनीतिक हथियार बनी मछली

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बंगाल में पहले चरण का चुनाव संपन्न हो चुका है। दूसरे चरण में 29 अप्रैल को वोट पड़ेंगे। इस चुनाव में कई आरोप-प्रत्यारोप परस्पर विरोधी पार्टियों ने एक-दूसरे पर लगाए। परंतु इंसानों की तरह एक न बोलने वाला जीव चुनाव प्रचार में बेतरह छाया रहा। यह जीव जल में रहने वाली मछली है, जिसे राजनेता अपनी भोजन की थाली से निकाल राजनीति की प्लेट तक ले आए। पश्चिम बंगाल में ‘मछली’ विधानसभा चुनावों में राजनीतिक नाटक का खूब हिस्सा बनी और वोट पकाऊ भूमिका में अपने जलवे बिखेर रही है। मछली को सांस्कृतिक निष्ठा के सबूत के तौर पर और बाहरी दखल के आरोपों का जवाब देने के लिए इस्तेमाल किया गया। चुनाव में यह कहावत कि ‘माछ-ए भात-ए बंगाली’ (मछली और चावल ही बंगाली की पहचान है) सिर्फ एक कहावत ही नहीं रही, उसने यह तक साबित कर दिया कि मछली बंगाल में जीने का एक तरीका है। आप किसी बंगाली को बंगाल से बाहर तो निकाल सकते हैं, लेकिन मछली के साथ उसका रिश्ता तोड़ना लगभग नामुमकिन है।

बंगाल में मछली सिर्फ खाना नहीं है और न ही सिर्फ खाने भर की एक रस्म..। यह यहां के खान-पान की जान है, जो यादों, रीति-रिवाजों और रोजमर्रा की जिंदगी में बुनी हुई है। पहचान और अपनेपन, दोनों का प्रतीक। मछली का दिखना ही वहां एक शुभ शगुन माना जाता है। सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, जो लगातार चौथी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही हैं, ने तो भाजपा को ‘बंगाल की जीवन शैली’ के लिए खतरा बता दिया। उन्होंने मछली और चावल को बंगाल की संस्कृति का एक ऐसा हिस्सा बताया है जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता। एक चुनावी सभा में कहा कि बंगाल मछली और चावल पर जीता है। भाजपा आपको मछली खाने नहीं देगी। मछली हाथ से फिसलती देख भाजपा ने भी पलटवार किया। उनके नेता इसे ममता का झूठा नैरेटिव बताते हैं और इसे भ्रष्टाचार से ध्यान हटाने की कवायद कहते हैं। मोदी ने खुद शाकाहारी होते हुए भी मछली को एक राजनीतिक मुद्दा बना लिया और इसे शासन की विफलता का प्रतीक बताया।

उन्होंने बनर्जी सरकार पर बंगाल को मछली के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में नाकाम रहने का आरोप लगाया कि सत्ता में 15 साल रहने के बाद भी तृणमूल कांग्रेस बंगाल वासियों को मछली जैसी बुनियादी चीज भी मुहैया कराने में नाकाम रही। यहां तक कि मछली भी राज्य के बाहर से मंगवानी पड़ती है। हालांकि ममता बनर्जी ने जवाब में कहा कि बंगाल की मछली की 80 प्रतिशत जरूरतें स्थानीय स्तर पर ही पूरी हो जाती हैं। सांस्कृतिक चिंताओं और आर्थिक आलोचनाओं के बीच मछली एक मुख्य भोजन से कहीं ज्यादा अब उन सभी चीजों का प्रतीक बन गई, जिनके बारे में विरोधी कहते हैं कि वे दांव पर लगी हैं।

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक और एक्वाकल्चर (मछली पालन) में दूसरे स्थान पर है, फिर भी प्रति व्यक्ति मछली की खपत के मामले में वैश्विक स्तर पर 129वें स्थान पर है। वर्ष 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि पश्चिम बंगाल में लगभग 65.7 प्रतिशत लोग हर हफ्ते मछली खाते हैं।

यह उन पूर्वी और दक्षिणी राज्यों की श्रेणी में आता है, जहां 90 प्रतिशत से ज्यादा लोग मछली खाते हैं। बंगाल में मछली का अर्थ हमेशा थाली से कहीं ज्यादा रहा है और इसके राजनीतिक महत्व को कोई नकार नहीं सकता। एक लेखक तो अपनी किताब में यहां तक लिखते हैं कि कीमती हिल्सा मछली इतनी अहम है कि ‘अगर बंगाली खान-पान विंबलडन होता, तो हिल्सा हमेशा सेंटर कोर्ट पर खेलती।’ गौरतलब है, हिल्सा मछली बंगाल की राजकीय मछली है। बंगाल में मछली का अर्थ भोजन से कहीं ज्यादा गहरा है। यह प्रवासन, वर्ग और स्वाद के गहरे इतिहास का एक प्रतीक है।

तृणमूल कांग्रेस तो खानपान के मुद्दे को अंडा-मांस तक ले आई और भाजपा पर बाहरी पार्टी होने का आरोप लगाकर यहां तक कह डाला है कि यह पार्टी बंगाल के लोगों को न सिर्फ मछली, बल्कि मांस-अंडा भी नहीं खाने देगी। यह मुद्दा ग्रामीण बंगाल के वोटरों के लिए बहुत मायने रखता है, जहां लोग गुजारा करने के लिए मांस पर निर्भर रहते हैं। भाजपा भी जानती है कि इस तरह की अफवाहों का वोटरों पर क्या असर पड़ सकता है। इसलिए भाजपाई नेता भी अपनी बंगाली पहचान पर जोर देने के लिए मछली के गुणगान गाते दिखे। ऐसा हो भी क्यों नहीं, जब बंगाल में रोज का खाना ‘माछ और भात’ (मछली और चावल) के इर्द-गिर्द ही घूमता है। हल्के-फुल्के राजनीतिक प्रचार से इतर देखें तो शायद मछली चुनाव के नतीजों का फैसला न कर पाए। लेकिन इसने यह दिखाया है कि कैसे चुनावी अभियान के दौरान संस्कृति और राजनीति एक-दूसरे में स्वाभाविक रूप से घुल-मिल जाते हैं। और यह भी कि ऐसे भावनात्मक मुद्दों को राजनीतिक दल कैसे दुहते हैं!

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