जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: हेट स्पीच मामलों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी अपराध को परिभाषित करना और उसकी सजा तय करना पूरी तरह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने कहा कि इस विषय में न्यायपालिका की भूमिका सीमित है और वह कानून बनाने या विधायिका को ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
पीठ ने क्या कहा
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अपराध का निर्माण और दंड का निर्धारण संसद और राज्य विधानसभाओं का विशेषाधिकार है। न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या कर सकती है, उसे बना नहीं सकती।
कानूनी ढांचा पर्याप्त
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हेट स्पीच जैसे मामलों से निपटने के लिए देश में पहले से पर्याप्त कानून मौजूद हैं। किसी “विधायी खालीपन” (legislative vacuum) का दावा सही नहीं है, इसलिए न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं बनती। कोर्ट के अनुसार, मौजूदा कानूनों को लागू करना संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है।
शक्तियों के विभाजन पर जोर
पीठ ने शक्तियों का विभाजन सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय संविधान के तहत न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से तय हैं। सभी संस्थाओं को अपनी-अपनी सीमाओं में रहकर कार्य करना चाहिए।
विधायिका पर छोड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि भविष्य में हेट स्पीच से निपटने के लिए नए कानून या नीति की जरूरत महसूस होती है, तो इसका निर्णय लेना पूरी तरह विधायिका का काम है। अदालत इस क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करेगी।

