डॉ.शालिनी गुप्ता, डॉ.आर.एस.सेंगर
एरोबिक धान उगाने की एक पद्धति है, जिसमें बौनी व न गिरने वाली किस्मों की सीधी बुवाई के द्वारा तथा आवश्यकतानुसार सिंचाई, खरपतवार तथा पोषक तत्वों का प्रबन्धन करके रोपे गये धान की तरह ही उपज ली जाती है। इस विधि में धान की बुवाई तथा खेती, गेहूँ की तरह की जाती है। खरीफ तथा वर्षा के मौसम में चूँकि घास ज्यादा उगती है, अत: उनका समयानुसार प्रबन्धन करके उनसे होने वाले नुकसान को पूर्णतया कम किया जाता है।
एरोबिक विधि की महत्वपूर्ण बातें
’ यह एक धान उगाने की तकनीक है, जिसे वर्षों से किसान उपराऊ, नीची व गहरे जलजमाव वाले क्षेत्रों मं सीधी बुवाई करते आये हैं। पहले खरपतवार निकालने के लिये बहुत प्रभावी खरपतवारनाशी रसायन उपलब्ध नहीं थे। बदलते परिवेश में अब ये रसायन बहुत कारगर हैं और 200 सही समय तथा सही विधि से छिड़काव कर खरपतवार से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।
’ इसे वर्षा आधारित क्षेत्रों में न उगाकर सिंचित क्षेत्रों में खेती की जाती है। यदि वर्षा नहीं हुई तो 10-12 दिन पश्चात सिंचाई अवश्य करें। उत्तर प्रदेश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में किए गए अध्ययन के अनुसार ऊपरी जमीन में तीन सिंचाई की आवश्यकता पड़ी, जबकि मध्यम व नीची भूमि में सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ी।
’ सिंचित क्षेत्रों में जो बौनी किस्में अनुसंशित हैं, उन्हीं किस्मों को एरोबिक विधि में भी उगाया जा रहा है किन्तु भविष्य में ऐसी किस्मों का विकास व चुनाव किया जा रहा है जो एरोबिक विधि से धान उगाने पर ज्यादा उपज दें। ऐसा मानना है कि सिंचित क्षेत्रों की अनुसंशित किस्मों की जड़ें पतली तथा सतह पर रहती हैं और खेत में पानी होने से उन्हेंनिचली गहराई से पानी लेने की जरूरत नहीं होती है। भविष्य में ऐसी किस्मों का विकास तथा चुनाव किया जा रहा है जिनकी जड़ें गहरी तथा थोड़ी मोटी हों और शुरू में उनकी जड़ें शीघ्र मिट्टी में गहराई में जाकर वर्षा न होने पर या पानी की कमी पर नीचे से पानी ले सकें।
’ धान बोने से लेकर काटने का समय वर्षा काल तथा सिंचाई की की सुविधा के अनुसार 100 दिन से 150 दिन (प्रकाश असंवेदी) का हो सकता है। प्रकाश संवेदी किस्में भी इस विधि से उगाई जा सकती हैं। जहां वर्षा 600 मिलीमीटर है वहां शीघ्र पकने वाली किस्में तथा जहां वर्षा 1000 मिलीमीटर है, वहाँ 125 दिन वाली मध्यम अवधि की किस्में तथा जहां वर्षा 1500 मिलीमीटर है वहाँ 150 दिन अवधि वाली किस्में 2000 उगा सकते हैं। वर्षा न होने पर सिंचाई की सुविधा अवश्य हो, बुवाई के समय वर्षा न होने पर सिंचाई करके 10 जून तक बुवाई अवश्य कर देना चाहिए, वर्षा काल 20 जून से शुरू होकर सितम्बर अन्त तक या उनी मध्य अक्टूबर तक रहता है।
’ विगत दो दशकों में एरोबिक खेती के लिए किस्मों का विकास हुआ है किन्तु इसमें चुनौतियां अभी ज्यादा हैं और ज्यादा उपज वाली किस्मों का विकास किया जाना बाकी है।
’ संकर धान की किस्मों की भी इस विधि से खेती की जा सकती है।
’ अनुसंधान के क्षेत्र में भी इसकी बुवाई का उचित समय, बुवाई की विधि, यंत्रों का प्रयोग तथा पोषक तत्वों का प्रबन्धन पर अनुसंधान की आवश्यकता है, साथ ही विभिन्न राज्य तथा क्षेत्रों के लिये विभिन्न अवधि की किस्मों का विकास तथा किसानों की सहभागिता व उनके खेतों में प्रत्यक्षण भी आवश्यक है।
एरोबिक विधि की कु अन्य विशेषताएं
सीधी बुवाई; बौनी किस्में; सूखा प्रतिरोधी क्षमता; खरपतवार नियन्त्रण, समेकित पोषक तत्व प्रबन्धन; समयानुसार सिंचाई; उपज क्षमता 4.5 टन प्रति हेक्टेयर से ज्यादा।

