कुछ तस्वीरें मन की आंखों में गहरे तक उतर जाती हैं। ऐसी ही वह तस्वीर थी जिसमें दिखाया गया था कि सुरक्षा के तमाम दस्तों के साथ कोई गणमान्य सामने बिछी लाल कालीन पर चल रहे हैं और लाल कालीन के बाहर स्कूल की फर्श पर तमाम बच्चे घुटनों पर झुके उन्हें अभिवादन कर रहे हैं। और गणमान्य की अगुआई में एकत्रित अन्य जन बेहद उल्लास के साथ इस द्रश्य को देख रहे हैं, संभवत: तालियां भी पीट रहे हैं। बाद में पता चला कि यह गणमान्य और कोई नहीं बल्कि मणिपुर के मुख्यमंत्री हैं जो ‘नशे के खिलाफ युद्ध’ के नाम पर जारी किसी अभियान के दौरान किसी स्कूल में पहुंचे हैं। और वहां छात्रों द्वारा उनका इस अंदाज में स्वागत किया जा रहा है। गौरतलब है कि जनाब ने अपने ही फेसबुक खाते से इस तस्वीर को सांझा किया गया था, जिसके नीचे अपनी प्रतिक्रिया भी दर्ज थी ‘मणिपुरी जनता की संस्क्रति और परंपरा को देख कर मुझे गर्व हो रहा है। कितना आश्चर्यजनक अनुशासन है।’ जैसा कि उम्मीद की जा सकती है किसी मध्ययुगीन बादशाह के दरबार की याद दिलाती इस तस्वीर को लेकर जबरदस्त हंगामा खड़ा हुआ, अलबत्ता मुख्यमंत्री महोदय ने इस मसले पर बाद में बिल्कुल चुप्पी ओढ़ ली। कहना मुश्किल है कि बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए बने राष्ट्रीय स्तर के आयोग के किसी सदस्य ने उपरोक्त तस्वीर को देखा या नहीं या देखने के बाद इसे लेकर अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय से कुछ अतिरिक्त जानकारी चाही या नहीं।
बहरहाल, मैं कल्पना करने लगा कि मुख्यमंत्री महोदय के उस ‘स्वागत’ के दौरान अगर किसी बच्चे ने उस मुद्रा को छोड़ कर कोई दूसरी मुद्रा अपनायी होती, मसलन अगर वह घुटने की किसी दिक्कत के कारण ही सही सीधे खड़ा हो गया होता तो क्या होता? क्या स्वागत समारोह उसी रफ्तार से चलता रहता या सुरक्षा कर्मियों में से कोई दौड़ कर उस बच्चे को पुरानी मुद्रा में खड़ा करवा देता, ‘झुको, बदतमीज कहीं के’ जैसी किसी शब्दावली का भी प्रयोग वह कर सकता था। या हो सकता है कि बच्चे पर झपटटा मार कर वह उसको कहीं किनारे ले जाता और यह तलाशने लगता कि इसने कोई हथियार तो नहीं रखा है, कहीं वह किसी ‘अन्य’ समुदाय का तो नहीं है? ऐसी संभावना से वैसे इंकार नहीं किया जा सकता।
इन दिनों जैसा आलम है, जैसा फोबिया पैदा किया गया है कि पश्चिमी मुल्कों में भी स्कूलों में कार्यरत अध्यापकों एवं बाकी कर्मचारियों के लिए ऐसे निर्देश मिलते रहते हैं कि जिन छोटे बच्चों की वह देखरेख करते हैं या उन्हें पढ़ाते हैं, ऐसे बच्चों पर उन्हें इस नजरिये से भी निगाह रखनी है कि क्या वह कल आतंकवादी बन सकते हैं?
मालूम हो कि कुछ साल पहले ब्रिटिश सरकार के ग्रह विभाग द्वारा आतंकवाद के खिलाफ तैयारी को मजबूती दिलाने के लिए जो 39 पेज का मसविदा जारी किया गया था उसमें यह स्पष्ट निर्देश दिया गया था।
(गार्डियन, 6 जनवरी 2015) इसमें साफ लिखा गया था: ‘प्रबंधन के वरिष्ठों को इस बात को सुनिश्चित करना होगा कि उनके स्टाफ को इस बात का प्रशिक्षण मिले कि वह ऐसे बच्चों को पहचान सकें जो आतंकवाद की तरफ आकर्षित हो सकते हैं और वह ऐसे अतिवादी विचारों को चुनौती भी दे सकें जो आतंकवाद को वैधता प्रदान करते हों।’ मुमकिन है हंगामे के बाद तत्कालीन सरकार ने इस आधिकारिक निर्देश को वापस लिया हो, अलबत्ता अनौपचारिक स्तर पर उस प्रक्रिया को जारी रखा हो। अगर हम घुटनों के बल पर गणमान्य के सम्मान में गर्दन झुकाए इन बच्चों अर्थात भारत के भावी नागरिकों के किस्से की तरफ फिर लौटें तो एक दूसरा मंजर आंखों के सामने नमूदार होता है, तस्वीर स्कूल की नहीं बल्कि कालेज की है जहां चंद अध्यापक कक्षाओं के पास बनी लॉबी से गुजर रहे हैं और वहां खड़े छात्र-छात्राएं गर्दन झुकाएं हैं और अध्यापकों के प्रति अपना सम्मान प्रगट कर रहे हैं। यह फोटो एक मित्र के अपने अलबम में थी, भूटान के एक कॉलेज में उसके अध्यापन कार्य के दौरान की।
मालूम हो भारत और भूटान सरकार के बीच कायम एक करार के तहत भारत के विश्वविद्यालयों के अध्यापक वहां पढ़ाने जाते हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापनरत इस मित्र ने वहां के अपने अनुभवों को सांझा करते हुए इस तस्वीर को भी दिखाया था, उसने बताया था कि यह एक आम नजारा है। एक तस्वीर दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र की तो दूसरी संवैधानिक राजशाही वाले निजाम की। गुणात्मक अंतर कर पाना बेहद मुश्किल।
यह पूछने का मन करता है कि किसी गणमान्य के सम्मान में बच्चों के समूह को घुटनों के बल झुक कर सलाम करने के लिए मजबूर करना कहां तक उचित है, विद्यार्थी विशेष का नहीं बल्कि विद्यार्थी समुदाय का अपने वरिष्ठों के सामने इस कदर झुकना कहां तक वाजिब है? अगर प्रबंधन गणमान्यों के प्रति अपने सम्मान का इजहार ही करना चाहता है तो वह उन्हीं बच्चों से तालियां पीटवा सकता था…मगर ऐसा नहीं किया गया और न ही किया जाता है, और संभवत: संस्कृति और परंपरा के बाहर की चीज माना जाता है। झुकना अनिवार्य है, फिर चाहे परिवार के बुजुर्गों के सामने झुको, स्कूल में अध्यापकों, गणमान्यों के सामने झुको, वयस्क होने पर बॉस, मालिक या सरकार या आस्था के प्रतीकों के सामने झुको। झुकने का प्रसंग चला है तो बरबस वह इतिहास के सफों में दर्ज एक ऐतिहासिक संघर्ष की भी याद दिला सकता है, जो ढाई सौ साल पहले यूरोप में ईसाई धर्म के अंदर लड़ा गया था।
मालूम हो कि उन दिनों चर्च ने किसी कोविले नामक व्यक्ति को चर्च के हिसाब से अनुचित आचरण के लिए उसके सामने झुकने की सजा दी थी। कोविले ने इस सजा के खिलाफ अपने जमाने के मशहूर दार्शनिक-विचारक-कार्यकर्ता वोल्टेयर से संपर्क किया। वोल्टेयर चर्च की इस ‘सजा’ से इस कदर उद्धेलित हुए कि किसी के सामने झुकने के लिए किसी व्यक्ति को कैसे मजबूर किया जा सकता है? उन्होंने इस सजा के खिलाफ जबरदस्त मुहिम खड़ी की, अपने वक्त़ के तमाम दार्शनिकों, विचारकों ने उनका मजबूती से साथ दिया और अंतत: चर्च को अपनी आचारसंहिता से सजा के इस प्रावधान को ही खतम करना पड़ा।
‘ब्रेकिंग द स्पेल ऑफ धर्मा’ शीर्षक अपने चर्चित निबंध में इस ऐतिहासिक लड़ाई का जिक्र करते हुए सुश्री मीरा नंदा बताती हैं कि किस तरह ऐसे ही छोटे-छोटे विद्रोहों से यूरोप में व्यक्तिगत आजादी और तर्कशीलता, वैज्ञानिक चिंतन का रास्ता सुगम होता गया। क्या झुकने के लिए अभ्यस्त ऐसे बच्चों, विद्यार्थियों से हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि वह कक्षाओं में सवाल पूछेंगे, जो बात समझ में नहीं आ रही हैं उसे जानने के लिए बेझिझक अपनी जुबां खोलेंगे, या कक्षा में प्रस्तुत जिस बात से असहमति है, उस असहमति के स्वरों का गला घोंट नहीं देंगे। अध्यापक जो कह रहा है उसे अंतिम सत्य मान कर मौन नहीं रहेंगे।


