Thursday, June 18, 2026
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हिंदू राष्ट्रवाद के खिलाफ थे अंबेडकर

Nazariya 9

Ankit Kumar Mishraआधुनिक भारत के निर्माताओं की अग्रिम पंक्ति में खड़े बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, कानूनविद, राजनेता और समाजसुधारक थे। बाबा साहेब भारत के संविधान निर्माता रहे। वह आजीवन दलितों के साथ हो रहे भेदभाव को मिटाने एवं स्त्रियों को उनका सामाजिक अधिकार दिलाने के लिए संघर्षरत रहे। लेकिन जब इन सबको मिलाकर एक शब्द में उनका परिचय दिया जाएगा तो हम कहेंगे कि बाबा साहेब सच्चे अर्थों में ‘राष्ट्रनिमार्ता’ हैं। वह एक प्रखर राष्ट्रवादी और समर्पित राष्ट्रभक्त थे। वर्ष 1940 में जब मुस्लिम लीग द्वारा भारत विभाजन एवं पाकिस्तान के निर्माण का प्रस्ताव पारित किए जाने के पश्चात बाबासाहेब ने ‘पाकिस्तान आॅर पार्टीशन आॅफ इंडिया’ नामक किताब लिखी। तदोपरांत 1945 उन्होंने ‘थाट्स आॅन पाकिस्तान’ लिखा। इन दोनों किताबों में उन्होंने भारतीय ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रवाद’ पर विस्तारपूर्वक अपने मौलिक एवं स्पष्ट विचार प्रस्तुत किए हैं।

बाबा साहेब के मतानुसार राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के बीच स्पष्ट अंतर है। ये मानव मन की दो भिन्न-भिन्न मन: स्थितियां हैं। उनकी राय में राष्ट्रीयता का तात्पर्य ‘सह-अस्तित्व की जागरूक चेतना’ से है वहीं राष्ट्रवाद का आशय ‘सह-अस्तित्व से बंधे हुए लोगों में एक अलग राष्ट्रीय अस्तित्व की इच्छा’ से है। आगे वह कहते हैं कि यह सच है कि राष्ट्रीयता के बिना राष्ट्रवाद का निर्माण नहीं हो सकता, परंतु यह कहना हमेशा सच नहीं हो सकता।
वे कहते हैं कि लोगों में राष्ट्रीयता की भावना उपस्थित हो सकती है, पर जरूरी नहीं है कि उनमें राष्ट्रवाद भी उपस्थित हो। अर्थात राष्ट्रीयता हमेशा राष्ट्रवाद को जन्म नहीं देती है। वे कहते हैं कि राष्ट्रीयता को राष्ट्रवाद में बदलने के लिए दो शर्तें जरूरी हैं। पहली, लोगों में एक राष्ट्र के रूप में रहने की आकांक्षा का जाग्रत होना, क्योंकि, राष्ट्रवाद इसी इच्छा की गतिशील अभिव्यक्ति है। और, दूसरी शर्त, एक ऐसे क्षेत्र का होना, जो एक राष्ट्र का सांस्कृतिक घर बन सके।
बाबासाहेब के राष्ट्रवाद की अवधारणा में संकीर्णता का कोई स्थान नहीं है।
उन्होंने कहा था कि मैं ब्राहमणवाद का विरोधी हूं किंतु व्यक्तिगत रूप से किसी ब्राह्मण का शत्रु कतई नहीं हूं। वह हिंदू धर्म के मानवीय समानता की व्यवस्था के प्रबल समर्थक जबकि जाति और वर्ण व्यवस्था के प्रबल विरोधी थे। वह भारत की मूल सांस्कृतिक धारा से बिल्कुल भी पृथक नहीं होना चाहते थे। यही वजह है कि जब उन्होंने धर्मांतरण किया तो हिंदू धर्म का त्याग कर इस्लाम या ईसाइयत को धारण नहीं किया बल्कि बौद्ध धर्म अपनाया। वहीं 1945 में लिखी अपनी किताब ‘थाट्स ओन पाकिस्तान’ में उन्होंने मुस्लिम सांप्रदायिकता पर भी करारा प्रहार किया।
बाबासाहेब भारतीय राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों में यकीन रखते थे। अपनी पुस्तक ‘थाट्स आन पाकिस्तान’ में वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की हिंदू राष्ट्र की विचारधारा के जनक विनायक दामोदर सावरकर द्वारा प्रतिपादित हिंदू राष्ट्रवाद और मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम राष्ट्रवाद की विचारधारा की तुलना करते हुए कहते हैं, ‘यह अजीब प्रतीत हो सकता है परंतु जहां तक एक राष्ट्र बनाम द्विराष्ट्र के मुद्दे का प्रश्न है, सावरकर और जिन्ना में कोई विरोध नहीं है। जबकि उल्टे, वे एक दूसरे से पूरी तरह से सहमत हैं।
दोनों सहमत हैं, सहमत ही नहीं बल्कि जोर देकर यह कहते हैं कि भारत में दो राष्ट्र हैं। एक हिंदू राष्ट्र और दूसरा मुस्लिम राष्ट्र। उनके मतभेद सिर्फ इस मुद्दे पर हैं कि इन दोनों राष्ट्रों को किन शर्तों के अधीन रहना होगा। जिन्ना का कहना है कि भारत को पाकिस्तान और हिंदुस्तान में बांट दिया जाना चाहिए। मुस्लिम राष्ट्र को पाकिस्तान में रहना चाहिए और हिंदू राष्ट्र को हिन्दुस्तान में। दूसरी ओर, सावरकर का जोर इस बात पर है कि यद्यपि भारत में दो राष्ट्र हैं तथापि भारत दो भागों में विभाजित नहीं किया जाना चाहिए|
जिनमें से एक भाग मुसलमानों का हो और दूसरा हिंदुओं का। बल्कि, दोनों राष्ट्र एक ही देश में रहेंगे जिसका एक संविधान होगा और यह कि यह संविधान ऐसा होगा जो हिंदू राष्ट्र को प्राधान्य देगा और मुस्लिम राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र के अधीन रहना होगा।
वे हिन्दू राष्ट्रवाद की अवधारणा के पूर्णत: खिलाफ थे। अपनी किताब के ‘मस्ट देयर बी पाकिस्तान’ हिस्से में वे लिखते हैं, ‘अगर हिंदू राज स्थापित हो जाता है तो नि:संदेह वह इस देश के लिए एक बहुत बड़ी आपदा होगी। हिंदू चाहे कुछ भी कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मार्ग में खतरा है। इसी कारण वह लोकतंत्र के साथ असंगत है। हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।’
बाबासाहेब की संकल्पना का राष्ट्र एक आधुनिक विचार है। वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की बात करते हैं, लेकिन वे इसे पश्चिमी विचार नहीं मानते हैं। वे इन विचारों को फ्रांसिसी क्रांति से न लेकर, बौद्ध परंपरा से लेते हैं। संसदीय प्रणालियों को भी वे बौद्ध भिक्षु संघों की परंपरा से जोड़ कर देखते हैं। बाबा साहेब का मत था कि राजनीतिक और प्रजातांत्रिक एकता की हिफाजत के लिए सामाजिक और आर्थिक समता स्थापित करने के लिए समुचित व्यवस्था अनिवार्य है।
वह आजीवन प्रयासरत रहे कि भारत विश्वपटल पर एकता, अखंडता और समानता का प्रतिक बन कर उभरे। बाबासाहेब एक ऐसे व्यापक, स्वस्थ और समृद्ध राष्ट्रवाद की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं जिसकी बुनियाद जाति, धर्म, वर्ण आधारित न होकर सिर्फ और सिर्फ भारतीयता हो। बकौल बाबासाहेब अंबेडकर राष्ट्र जब लोगों की सामूहिक चेतना में है, तभी सच्चे अर्थों में वह राष्ट्र है।


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