Thursday, April 30, 2026
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: क्लारा जेटकिन व सरोजिनी नायडू ने रखीं नींव की ईंटें

कृष्ण प्रताप सिंह |

KRISHNA PRATAP SINGHभारतीय समाज में महिलाओं को देवी का दर्जा दिया जाता है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरूरत पूरी हो जाएगी। आज जरूरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी। इसीलिए महिलाओं के उत्थान के लिए एक स्वस्थ परिवार की जरुरत होती है जो राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है। आज भी कई पिछड़े क्षेत्रों में माता-पिता की अशिक्षा, असुरक्षा और गरीबी की वजह से कम उम्र में विवाह और बच्चे पैदा करने का चलन रहता है। भारत में हर वर्ष दो महिला दिवस मनाये जाते हैं, जिनमें एक राष्ट्रीय है और दूसरा अंतरराष्ट्रीय। राष्ट्रीय महिला दिवस 13 फरवरी को मनाया जाता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च को। पहले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बात करें तो यह 1910 में नामचीन महिला अधिकारवादी क्लारा जेटकिन द्वारा डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में सोशलिस्ट इंटरनेशनल में कामकाजी महिलाओं के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दिए गए इसे मनाने के सुझाव का फल है, जबकि राष्ट्रीय महिला दिवस उन सरोजिनी नायडू की जयंती, जो भारतकोकिला, जानी-मानी कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी तो थीं ही, मानती थीं कि पुरुष देश की शान हैं तो महिलाएं उसकी नींव। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान इस नींव को मजबूत करने के लिए उन्होंने बहुविध जतन किए। विडम्बना यह कि अब इन दोनों महिला दिवसों पर और तो बहुत कुछ होता है, उनकी नींव की ईंटें रखने वाली इन दोनों शख्सियतों को अपवादस्वरूप ही याद किया जाता है।

जहां तक क्लारा जेटकिन की बात है, वे पांच जुलाई, 1857 को जर्मनी के एक गांव में पैदा हुर्इं और समय के साथ मार्क्सवादी सिद्धांतकार, सामाजिक कार्यकर्ता और महिलाओं के अधिकारों के जुझारू संघर्ष की अगुआ बनीं। उनके पिता गॉटफ्राइड ईस्नर किसान पृष्ठभूमि वाले शिक्षक थे और फ्रांसीसी मूल की मां जोसफीन विटाले ने भी उच्च शिक्षा ग्रहण कर रखी थी। स्वाभाविक ही क्लारा जेटकिन बचपन से ही समाजवादी विचारधारा से प्रभावित हो चली थीं। 1878 में बिस्मार्क ने जर्मनी में समाजवादी गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी तो उसके चार साल बाद 1882 में वे पहले ज्यूरिख फिर पेरिस चली गर्इं और पत्रकार व अनुवादक के रूप में काम करती रहीं। पेरिस में उन्होंने सोशलिस्ट इंटरनेशनल ग्रुप की नींव भी डाली।

उन्हीं के दौर में 1908 में कोई पंद्रह हजार महिलाओं ने न्यूयॉर्क में एक परेड निकालकर महिला कामगारों के काम के घंटे कम करके उन्हें अच्छी तनख्वाह और सारी वयस्क महिलाओं को वोट डालने का हक देने की मांग की। इसके एक साल बाद अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की घोषणा की तो क्लारा जेटकिन ने उसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने की सोची। जैसा कि पहले बता आए हैं, 1910 में कोपेनहेगेन के सम्मेलन में 17 देशों से आई 100 महिलाओं ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के उनके सुझाव को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया तो पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 1911 में आॅस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड में मनाया गया। 1975 से संयुक्त राष्ट्र ने भी इसका जश्न मनाना शुरू कर दिया तो उसे इसकी औपचारिक मान्यता के तौर पर देखा गया और आज यह दिवस, समाज, सियासत और आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं द्वारा तय की गई मंजिलों का उत्सव मनाने और बची रह गई असमानताओं व शोषणों को खत्म करने के संकल्प लेने का दिन है।

प्रसंगवश, क्लारा जेटकिन ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की कोई तारीख नहीं सुझाई थी। इसकी आठ मार्च की तारीख तो पहले विश्वयुद्ध के दौरान 1917 के बोल्शेविक क्रांति वर्ष में तय हुई, जब रूस की महिलाओं ने ‘रोटी और अमन’ की मांग करते हुए जार निकोलस द्वितीय की हुकूमत के खिलाफ हड़ताल कर दी थी। अनंतर, जार सत्ता के खात्मे के बाद बनी अस्थायी सरकार ने महिलाओं को मताधिकार दे दिया था।

क्लारा जेटकिन की ही तरह सरोजिनी नायडू का व्यक्तित्व भी बहुआयामी था। वे प्रख्यात कवयित्री व स्वतंत्रता सेनानी तो थीं ही, बहुभाषाविद और महिलाओं में जागरूकता की फिक्रमंद कार्यकर्ता भी थीं। 1925 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं तो दूसरी महिला अध्यक्ष श्रीमती एनी बेसेन्ट की गहरी दोस्त थीं। बापू उन्हें ‘भारत कोकिला’ और अपनी प्रिय शिष्या कहते थे, जबकि विनोद में वे उन्हें ‘मिकी माउस’ कहती थीं। उन्हें बिहार से संविधान सभा की सदस्य भी चुना गया था। आजादी के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) की पहली राज्यपाल बनीं तो राज्यपाल बनने वाली देश की पहली महिला भी बन गर्इं। उनकी मानें तो फिर भी वे ‘राजभवन के पिंजरे में कैद जंगल के पक्षी’ जैसा अनुभव करती थीं। लेकिन सांसें रहते उन्हें इस ‘कैद’ से मुक्ति नहीं मिल पाई और लखनऊ के राजभवन में ही दो मार्च, 1949 को हृदयगति रुक जाने के कारण उनका निधन हो गया था।

13 फरवरी, 1879 को हैदराबाद में एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्मी सरोजिनी अपनी कवयित्री माता वारद सुन्दरी देवी और वैज्ञानिक व शिक्षाशास्त्री पिता डॉ. अघोरनाथ चट्टोपाध्याय की पहली संतान थीं-आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी। अभी वे 15 साल की ही थीं कि डॉ. गोविंद राजालु नायडू के प्रति अनुरक्त हो उठी थीं और 19 साल की होती-होती उनसे अंतरजातीय विवाह कर लिया था। उस दौर में अंतरजातीय विवाह आसान नहीं होता था, क्योंकि उसकी सामाजिक स्वीकृति लगभग नहीं के बराबर थी। लेकिन उनके पिता ने उनका साथ दिया था, जिससे वे सरोजिनी चट्टोपाध्याय से सरोजिनी नायडू बन गई थीं। उनका वैवाहिक जीवन बहुत सुखमय रहा था और वे जय सूर्या, पदमज, रणधीर और लीलामणि नाम के चार बच्चों की मां थीं। वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान वे देश के राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होकर स्वतंत्रता संग्राम का में कूदीं तो पीछे मुड़कर नहीं देखा-सविनय अवज्ञा आंदोलन में बापू के साथ जेल गईं तो 1942 में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में भी 21 महीने जेल में रहीं। नमक सत्याग्रह के दौरान भी वे बापू के साथ थीं और उनकी गिरफ्तारी के बाद उनकी ज्यादातर जिम्मेदारियां वही संभालती थीं। अपनी सामाजिक राजनीतिक सक्रियताओं के बावजूद उन्होंने अपनी साहित्य-सेवा से कभी समझौता नहीं किया।

सार्वजनिक जीवन में वे गहरी ईमानदारी, भाषणों में अधिक साहस और कार्रवाई में अधिक ईमानदारी की पैरोकार थीं। गुलामी के दौर में प्लेग की महामारी से बचाव के प्रयत्नों में उनके योगदान के लिए उन्हें कैसर-ए-हिन्द पुरस्कार दिया गया था, जबकि 1964 में उनकी जयंती पर उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया था।


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