Friday, May 1, 2026
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पूंजीवाद के दौर में कार्ल मार्क्स

Samvad


KRISHNA PRATAP SINGHपूंजीवाद की जय और साम्यवाद की पराजय के उद्घोष के इस दौर में वैज्ञानिक समाजवाद के प्रणेता दार्शनिक, अर्थशास्त्री, समाजविज्ञानी और पत्रकार कार्ल मार्क्स (1818 में जिनका जर्मनी में आज के ही दिन जन्म हुआ) की यादें एक बड़ी विडम्बना की शिकार हैं। यह कि आम तौर पर उन्हें याद करना जरूरी नहीं समझा जाता, लेकिन भुलाना भी संभव नहीं हो पाता। इसलिए कार्ल मार्क्स हैं कि बरबस याद आते रहते हैं-प्राय: सताने की तर्ज पर। उन्हें भी जो उनके अनुयायी होने का दावा करते हैं और उन्हें भी जो उनसे परहेज बरतना चाहते और परहेज से ज्यादा ‘दुश्मनी’ पर आमादा रहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो कार्ल मार्क्स के अनुयायियों की परेशानी यह है कि वे उन्हें ‘स्थापित’ नहीं कर पाए हैं तो ‘दुश्मनी’ पर आमादा रहने वालों की यह कि उन्होंने भले ही उनके विचारों का दुर्दिन सें सामना करा दिया है, उनको पूरी तरह खारिज या ‘विस्थापित’ नहीं कर पा रहे।

इसे यों समझ सकते हैं कि जिस पूंजीवाद से मार्क्स अपनी आखिरी सांस तक दो दो हाथ करते रहे, उसके सब कुछ अपनी मुट्ठी में केंद्रित कर लेने के बावजूद उसके पैरोकार न मार्क्स द्वारा वर्णित पूंजी के मनुष्यमात्र को हृदयहीन बनाने के पुराने इतिहास को नकार पा रहे हैं, न ही 1844 में दी गई इस चेतावनी को कि ‘पूंजी जैसी निर्जीव वस्तु सजीवों-खासकर मनुष्यों-को संचालित करेगी तो उन्हें हृदयहीन बना देगी।’

उलटे कई बार अपने कमजोर क्षणों में उन्हें लगता है कि मार्क्स को उनके अनुूयायियों से ज्यादा वही ‘सही’ सिद्ध किये दे रहे हैं। क्योंकि उन्हें गलत सिद्ध करने के लिए पूंजी को मनुष्यमात्र के प्रति सहृदय बनाने की लाजिमी शर्त है कि उनसे पूरी नहीं हो रही।

प्रसंगवश, 1837 में मार्क्स ने अपने पिता को एक पत्र में लिखा था, ‘संसार में सबसे ज्यादा खुशी उसी को मिलती है, जो सबसे ज्यादा लोगों की खुशी के लिए काम करता है।’ वे मानते थे कि ‘पूंजीवादी समाज में पूंजी स्वतंत्र और व्यक्तिगत होती है जबकि जीवित व्यक्ति उसके आश्रित होता है और उसकी कोई वैयक्तिकता नहीं होती।’

उन्होंने तभी समझ लिया था कि अंधाधुंध उपभोग हमें खुशी के पास नहीं ले जाता, उससे और दूर करता है। इसलिए उनका विचार था, ‘जरूरत तब तक अंधी होती है, जब तक उसे होश न आ जाये। आजादी जरूरत की चेतना होती है।’

हां, राजनीति, अर्थशास्त्र, दर्शन, समाजशास्त्र, श्रम, इतिहास और प्रकृति के साथ वैज्ञानिक विश्लेषणों के विभिन्न मोर्चों सक्रिय रहे इस क्रांतिकारी को दुनिया खासतौर से मनुष्य की मुक्ति कामना को नया सैद्धांतिक आयाम देने वाली बहुचर्चित कृति ‘दास कैपिटल’ और साथ ही ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र’ के लिए जानती है।

लेकिन हमारे देश में उनके विचारों को लेकर आज भी अनेक भ्रम फैले हुए हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है-उनका बहुप्रचलित कथन ‘धर्म लोगों के लिए अफीम है’।
निस्संदेह, उनका मानना था कि लोगों की खुशी के लिए पहली आवश्यकता ‘धर्म का अंत’ है। लेकिन उन्होंने मनुष्यता के इतिहास में धर्म द्वारा निभाई गई भूमिका को कभी भी एकतरफा तौर पर खारिज नहीं किया।

दरअस्ल, उन्होंने कहा था, ‘धर्म दीन प्राणियों का विलाप है, बेरहम दुनिया का हृदय है और निष्प्राण परिस्थितियों का प्राण है। मानव का मस्तिष्क जो न समझ सके, उससे निपटने की नपुंसकता है। यह लोगों की अफीम है और उनकी खुशी के लिए पहली आवश्यकता इसका अंत है।’

उनके अनुसार ‘अमीर गरीबों के लिए कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन उनके ऊपर से हट नहीं सकते। जमींदार, किसानों के विपरीत, वहां से काटना पसंद करते हैं, जहां उन्होंने कभी बोया ही नहीं।’ निश्चित रूप से इसी कारण वे इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि ‘जीवन एक लगातार चलता रहने वाला संघर्ष है जबकि क्रांतियां इतिहास की इंजन।’

इसी तरह ‘बिना उपयोग की वस्तु हुए किसी चीज की कोई कीमत नहीं हो सकती।….कंजूस एक पागल पूंजीपति है, जबकि पूंजीपति एक तर्कसंगत कंजूस।’ लेखकों के बारे में उनकी राय है, ‘जीने और लिखने के लिए लेखक को पैसा कमाना चाहिए। लेकिन किसी भी सूरत में पैसा कमाने के लिए जीना और लिखना नहीं चाहिए।…लेखक इतिहास के किसी आन्दोलन को शायद बहुत अच्छी तरह से बता सकता है, लेकिन निश्चित रूप से वह उसे बना नहीं सकता।’

उनके साम्यवाद के सिद्धांत को उन्हीं के अनुसार एक वाक्य में अभिव्यक्त किया जा सकता है-सारी निजी संपत्ति को खत्म किया जाए।…हर किसी से उसकी क्षमता के अनुसार काम लिया जाए और हर किसी को उसकी जरूरत के अनुसार दाम दिया जाये।…माना जाए कि नौकरशाहों के लिए दुनिया महज हेरफेर करने की वस्तु है।’

यहां मजदूरों के संदर्भ में उनके इस प्रसिद्ध कथन को भी याद रखा जाना चाहिए कि उनके पास खोने को सिर्फ जंजीरें हैं, जबकि जीतने को सारी दुनिया। वे लोगों के विचारों को उनकी भौतिक स्थिति के सबसे प्रत्यक्ष उद्भव बताते हैं जबकि लोकतंत्र को समाजवाद तक जाने का रास्ता मानते और कहते हैं कि महिलाओं के उत्थान के बिना कोई भी महान सामाजिक बदलाव असम्भव है।

उनके शब्दों में ‘सामाजिक प्रगति महिलाओं, जिनमें बुरी दिखने वाली महिलाएं भी शामिल हैं, की सामाजिक स्थिति देखकर ही मापी जा सकती है।’ दिलचस्प यह कि एक समय उन्होंने कहा था कि ‘अगर कोई एक चीज निश्चित है तो यह कि मैं खुद मार्क्सवादी नहीं हूं।’

लेकिन 14 मार्च, 1883 को लंदन में अंतिम सांस लेने तक संसार समर में लड़ते हुए उन्होंने मनुष्य को उसमें जीतने और मुक्त होने की जो राह सुझाई, उसे मार्क्सवाद नाम से ही जाना जाता है और आज की तारीख में उसके बारे में प्राय: सारी जिज्ञासाओं को इतनी उलझनों व पूर्वाग्रहों के हवाले कर दिया गया है कि जिज्ञासु उन्हें सुलझाते-सुलझाते और उलझकर रह जाते हैं।

अकारण नहीं कि उनकी स्थापनाओं की विफलताओं की तोहमत उनके उन अनुयायियों पर लगायी जाती है जो खुद को उनसे दगा करने से नहीं रोक पाये।
एक विचारक के शब्दों में कहें तो कार्ल मार्क्स के दुश्मन तो वैसे ही हैं, जैसा वे उन्हें समझते थे। लेकिन अपने अनुयायियों को पहचानने में उन्हें धोखा हुआ है।

इस विचारक के अनुसार मार्क्स से पहले गौतम बुद्ध और ईसा मसीह वगैरह ने भी शोषणरहित समाज का सपना देखा और उसके लिए शोषकों के हृदयपरिवर्तन का रास्ता सुझाया था। इस रास्ते को लंबे वक्त तक आजमाये जाने के बाद कार्ल मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का रास्ता सुझाया। अब उसके आगे का सवाल यह है कि इस रास्ते भी शोषणमुक्त समाज संभव नहीं हो पा रहा तो कौन सा नया रास्ता चुना जाए?


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