Thursday, October 28, 2021
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नील हरित शेवाल से जैव उर्वरक तैयार करना

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रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशक के इस्तेमाल के कारण किसानों की जमीन अब बंजर के समान होने लगी है। जिसको देखते हुए किसान भाई अब जैविक खेती पर जोर देने लगे हैं। वर्तमान में जैविक तरीके से खेती करने में भारत के किसान काफी जागरूक हो चुके हैं।

और सरकार की तरफ से भी जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की सहायता प्रदान की जा रही हैं। खेती में प्रयोग में होने वाले रासायनिक उर्वरक दिन प्रतिदिन महंगे होते जा रहे हैं और साथ ही इनका इस्तेमाल भूमि के लिए उपयुक्त नही होता जिसको देखते हुए अब कई तरह के जैव उर्वरकों का निर्माण होने लगा हैं।

जिसे प्राकृतिक चीजों से बनाया जाता है। इनमें ज्यादातर जैव उर्वरकों को किसान भाई अपने घरों पर ही बना सकते हैं। जिनमें कम्पोस्ट खाद, केंचुआ खाद, वर्मी कम्पोस्ट, राइजोबियम कल्चर और भी कई तरह की जैविक उर्वरक हैं। इन सभी उर्वरकों को गोबर और अपशिष्ट पदार्थों के मध्य से तैयार किया जाता है।

आज हम आपको नील हरित शैवाल से खाद बनाने के बारें में जानकारी देने वाले हैं। जिसे किसान भाई अपने घर पर ही आसानी से तैयार कर सकता है।

नील हरित शैवाल क्या होता है?

नील हरित शैवाल पानी के ऊपर दिखाई देने वाली काई को कहा जाता है। जो एक जीवाणु फायलम होता है। यह वातावरण की नाइट्रोजन का यौगिकीकरण कर पौधों के लिए नाइट्रोजन का निर्माण करती है।

जिसको किसान भाई आसानी से अपने घर पर कम खर्च में बना सकता हैं। और रासायनिक उर्वरकों पर होने वाले अनावश्यक खर्च से बच सकते हैं।

उर्वरक बनाने के लिए आवश्यक तत्व

नील हरित शैवाल से जैव उर्वरक बनाने के लिए खास तत्वों की जरूरत नही होती। इसको पानी से भरे टैंकों में बनाया जाता है। जिसका निर्माण किसान भाई अपनी भूमि के आधार पर करवा सकता है।

इसका पक्का टैंक ईंट और चुने के माध्यम से तैयार किया जाता है। एक हेक्टेयर खेती के लिए नील हरित शैवाल से जैव उर्वरक तैयार करने के लिए लगभग 5 मीटर लम्बा, एक से डेढ़ फिट गहरा और डेढ़ मीटर के आसपास चौड़े टैंक की जरूरत होती है। पक्के टैंक से लगातार कई सालों तक उर्वरक प्राप्त कर सकते हैं। टैंक के निर्माण के दौरान टैंक से पानी निकासी की व्यवस्था कर लेनी चाहिए।

पानी के टैंक के अलावा सिंगल सुपर फास्फेट, मिट्टी और पानी को उपचरित करने के लिए कार्बोफ्यूरान या मेलाथियान का इस्तेमाल किया जाता है। इन सभी तत्वों को उचित मात्रा में पानी में घोलकर इसको तैयार किया जाता है।

जैव उर्वरक बनाने की विधि

नील हरित शैवाल से जैव उर्वरक तैयार करने के दो प्रमुख तरीके हैं। जिनके टैंक और गड्डे विधि के नाम से जाना जाता है।
टैंक विधि : टैंक विधि से जैव उर्वरक बनाने के लिए पहले टैंकों में डेढ़ से दो किलो साफ और भुरभुरी दोमट मिट्टी को प्रति वर्ग मीटर की दर से टैंक में डालकर अच्छे से फैला दें।

उसके बाद टैंक में आधा फिट के आसपास पानी भर दें। टैंक में पानी भरने के बाद उसमें लगभग 100 ग्राम प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से सुपर फॉस्फेट या रॉक फास्फेट को पानी में डालकर मिला दें। सुपर फॉस्फेट या रॉक फास्फेट मिलाने के बाद पानी का पीएच मान सामान्य करने के लिए उसमें उचित मात्रा में चुना डालकर पानी का पी।एच। मान जांच लें।

अगर पानी का पीएच मान सामान्य हो तो चूना ना डालें। चूना मिलाने के बाद जब पानी साफ दिखाई देने लगे तब टैंक में 100 ग्राम नील हरित शैवाल का मातृ कल्चर पानी पर छिड़क दें।

पानी के टैंकों में अधिक समय तक भरे रहने के कारण उसमें कई तरह के जीवाणु उत्पन्न हो जाते हैं। जिनकी रोकथाम के लिए टैंकों में 1 मिली लीटर मेलाथियान या 3 ग्राम कार्बोफ्यूरान प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से पानी में मिला दें। उसके बाद ध्यान रखे की गड्डों का पानी सुखने ना पाए।

इसके लिए उनमें समय समय पर पानी छोड़ते रहे। लगभग तीन से चार दिन में पानी की सतह पर काई जमने लगती है। जो लगभग 15 से 20 दिन बाद एक मोटे तह के रूप में जम जाती है। जब इसकी मोटी परत बन जाती है तब काई को बड़े झरनों के माध्यम से निकालकर एकत्रित किया जाता है।

या फिर पानी को सुखाने के बाद उसे निकाल लिया जाता है। इस क्रिया को बार बार दोहराकर किसान भाई जैविक खाद तैयार कर सकता है।

कच्चे गड्डे की विधि : कच्चे गड्डे की विधि में भी टैंक विधि की तरह ही खाद तैयार की जाती है। इस विधि से खाद तैयार करने के दौरान भूमि में गड्डे को खोदकर तैयार किया जाता है। जिसका आकार पक्के टैंक की तरह ही होता है। लेकिन गहराई दो फिट से ज्यादा रखी जाती है।

जिस जगह पानी की मात्रा भरपूर पाई जाती है, और मिट्टी में जलधारण की क्षमता अधिक पाई जाती है। वहां इसके गड्डे बिना पौलिथिन के बना सकते हैं। लेकिन जहां पानी कम मात्रा में हो और मिट्टी में जल भराव ना होता हो वहां गड्डों में पॉलीथीन को बिछा दिया जाता है।

ताकि भूमि में पानी का रिसाव ना हो पाए। पॉलीथीन बिछाने के बाद गड्डों में पक्के गड्डों की तरह आवश्यक तत्व डालकर उन्हें तैयार किया जाता है। जब गड्डों में काई की मोटी परत बनकर तैयार हो जाती है तब उसे उतारकर एकत्रित कर लिया जाता है।

जिसे किसान भाई उर्वरक के रूप में इस्तेमाल कर लेते हैं। लेकिन इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल धान की फसल में किया जाता है। जो काफी ज्यादा उपयोगी होता है।

नील हरित शैवाल का इस्तेमाल और लाभ

नील हरित शैवाल के माध्यम से तैयार किये गए जैव उर्वरक का इस्तेमाल धान, गेहूं, मक्का जैसी कई फसलों में किया जाता है। नील हरित शैवाल के माध्यम से तैयार जैव उर्वरक का मुख्य रूप से इस्तेमाल पौधों में नाइट्रोजन की आपूर्ति के लिए किया जाता है। जो पौधों के विकास में सहायक होती है।

किसी भी फसल में नील हरित शैवाल जनित जैव उर्वरक का इस्तेमाल पौधों के विकास के दौरान किया जाता है। धान की फसल में इसका इस्तेमाल पौधों के खेत में रोपाई के लगभग दो सप्ताह बाद कर लेना चाहिए। जिसमें इससे तैयार उर्वरक को खेत में डालकर छोड़ दें।

धान की फसल में इसको डालने के दौरान उसमें पानी भरा रहना चाहिए।
इसके इस्तेमाल से खेतों में फसल को यूरिया की आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि यूरिया का इस्तेमाल पौधों में नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। और नील हरित शैवाल से तैयार जैव उर्वरक भी भूमि में नाइट्रोजन की आपूर्ति करता हैं।

जिस खेत में एक बार इसका इस्तेमाल किया जाता है। उसमें दूसरी फसल को उगाने के दौरान भी यूरिया की जरूरत नही होती। इसके इस्तेमाल से भूमि की उर्वरक क्षमता बढती है। और भूमि प्रदूषण में कमी आती है।

और साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार देखने को मिलता है। इसके इस्तेमाल के बाद पौधों का अंकुरण अच्छे से होता है। और पौधे विकास भी समान रूप से करते हैं।

उर्वरक बनाते समय ध्यान रखने योग्य बातें

  • नील हरित शैवाल के माध्यम से जैव उर्वरक बनाते समय काफी चीजों का ध्यान रखा जाता है।
  • जैव उर्वरक बनाने के लिए पानी का स्रोत अधिक दूर नही होना चाहिए।
    गड्डों को उर्वरक के तैयार होने तक सूखने ना दें।
  • किसी भी गड्डे से तीन बार उर्वरक तैयार करने के बाद उसमें रॉक फास्फेट जैसे बाकी तत्वों की आधी मात्रा को फिर से गड्डों में डालना चाहिए।
  • इसके उत्पादन के लिए खुली जगह की जरूरत होती है। क्योंकि नील हरित शैवाल सीधी पड़ने वाली धूप में अच्छे से विकास करता है।
  • 40 डिग्री से अधिक तापमान होने पर इसका विकास प्रभावित होता है। जबकि 25 से 30 डिग्री के बीच का तापमान इसके विकास के लिए बहुत अच्छा होता है।
  • सामान्य पीएच और हल्की क्षारीय भूमि इसके लिए सबसे उपयुक्त होती है।

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