Friday, May 1, 2026
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हजरत अली अलैहिस सलाम की शहादत पर विशेष:-

  • समूची दुनिया को अमन और इंसानियत का दिया पैगाम

जनवाणी संवाददाता |

बेहट:  अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के चाचा जात भाई और उनके दामाद हजरत अली अलैहिस्सलाम की शहादत 21 रमजान को हुई थी। इनके दुश्मन ने मस्जिदे कूफा में 19 रमजान को नमाजे फजर पढ़ते हुए वार किया था, लिहाजा हजरत अली अलै. जख्मी हो गए थे और 21 रमजान को शहादत हो गई थी।

हजरत अली अलै. की शहादत 21 रमजान, 40 हिजरी को इराक के कूफा शहर की मस्जिदे कूफा में हुई थी। राजधानी उस वक्त कूफा में थी। नमाजे फजर पढ़ने के लिए हजरत अली अलै. मस्जिदे कूफा में तशरीफ ले गए। उस वक्त उनका दुश्मन अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम मलून सफ के अंदर छुपा हुआ था जिसे मौला अली अलै. ने देख लिया था। मगर मौला अली अलै. ने उसे नजर अंदाज कर दिया और नमाज पढ़ने लगे।

जैसे ही हजरत अली अलैहिस्सलाम सजदे में गए तभी अब्दुल रहमान इब्ने मुलजिम ने उन पर वार करते हुए नेजा मार दिया। इससे हजरत अली अलै. जख्मी हो गए और उन्हें उनके घर पहुंचा दिया गया और अब्दुर रहमान इब्ने मुलजिम को गिरफ्तार कर लिया गया। हजरत अली अलै. उस वक्त रोजे से थे। जब रात को हजरत अली अलै. को रोजा इफ्तार के लिए खजूर और दूध पेश किया गया तो उन्होंने उस दूध और खजूर को अपने कातिल अब्दुल रहमान इब्ने मुलजिम को देने के लिए कहा।

उस दूध और खजूर से अब्दुल रहमान ने रोजा खोला। जो दूध मौला अली अलै. के इप्तार के लिए लाया गया था और हजरत अली अलैहिस्सलाम ने नमक से रोजा खोला 21 रमजान को आप इस दुनिया को छोड़कर अपने रब की खिदमत में चले गए। हजरत अली अलै. की विलादत मक्का शहर में खाना ए काबा में हुई थी। उनके वालिद का नाम हजरत अबूतालिब अलै. था। हजरत अली अलै. को दीन ए इस्लाम में वह जगह हासिल है कि उनको अल्लाह का शेर का कहा गया। दस्ते यदुल्लाह कहा गया। आबूतुराब कहा गया।

उनको हैदर के नाम से भी जाना जाता है। जब इस्लाम का कोई भी हमदर्द या मददगार नहीं था, उस वक्त हजरत अली अलै. ने इस्लाम को अपने खून से सींच कर आम लोगों तक पहुंचाया। हजरत अली अलै. की दीन की खिदमत को देखते हुए हुए हजरत मुहम्मद स. अ. व. ने उन्हें अपना खलीफा और उत्तराधिकारी मुकर्रर फरमाया।

हजरत अली अलै. ने दुनिया को अमन खुलूस इंसानियत का पैगाम दिया। उन्होंने हर इंसान को अच्छे अखलाक और खुश मिजाजी और दूसरे की मदद करने के लिए हुकुम दिया है। हजरत अली अलै. की शहादत के बाद उन्हें मुसलमान 21 रमजान को याद करते हैं और उनकी याद में मजलिसे और नजर का एहतमाम करते हैं।

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