Tuesday, January 25, 2022
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गरीबी से निपटने की सघन चुनौती

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नीति आयोग की पहली बहुआयामी गरीबी सूचकांक रिपोर्ट (एमपीआई) चिंतित करने वाला है कि देश के अधिकांश राज्य अभी भी गरीबी की जद में हैं। रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड देश के सबसे गरीब राज्यों में शुमार हैं। आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 51.91, झारखंड में 42.16 और उत्तर प्रदेश में 37.79 फीसद लोग अभावग्रस्त जीवन गुजारने को विवश हैं। इसी तरह मध्यप्रदेश 36.65 फीसद के साथ चौथे और मेघालय 32.67 फीसद के साथ पांचवे स्थान पर है। कुपोषितों की संख्या में बिहार सबसे ऊपर है, जबकि झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ उससे थोड़ी बेहतर स्थिति में हैं। यहां जानना आवश्यक है कि नीति आयोग द्वारा बहुआयामी गरीबी सूचकांक तैयार करते समय मुख्य रूप से परिवार की आर्थिक स्थिति और अभाव की स्थिति पर फोकस किया गया है। भारत के बहुआयामी गरीबी सूचकांक को तैयार करने में तीन सामान आयामों मसलन वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर का मूल्यांकन किया गया है। इसका आंकलन पोषण, बाल और किशोर मृत्युदर, प्रसवपूर्व देखभाल, स्कूली शिक्षा के वर्ष, उपस्थिति, भोजन बनाने के ईंधन, स्वच्छता, जल की उपलब्धता, बिजली, आवास, संपत्ति और बैंक खाते जैसे 12 संकेतक हंै। गौर करें तो मौजूदा हालात यानि गरीबी का दायरा बढ़ने के लिए कोरोना महामारी भी काफी हद तक जिम्मेदार है। यह महामारी भारत में ऐसे समय में आयी जब देश में एक दशक में सबसे कम आर्थिक वृद्धि दर्ज की गई थी। सुस्त अर्थव्यवस्था ने सर्वाधिक रुप से ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों पर ज्यादा असर डाला।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल सोशल मोबिलिटि रिपोर्ट 2020 के मुताबिक भारत के किसी गरीब परिवार को मध्यम वर्ग में आने में सात पीढ़ियों का समय लगता है। ऐसे में करोड़ों लोग जो कोरोना महामारी के कारण आर्थिक बदहाली का शिकार हुए हैं, उन्हें उबरने में वक्त तो लगेगा ही। पर इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि भारत गरीबी से निपटने और पार पाने की दिशा में धीरे-धीरे ही सही कामयाब हो रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत ने 2006-2016 के दरम्यान गरीबी से निपटने में अहम सफलता हासिल की। इसका खुलासा गत वर्ष संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और आॅक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआइ) द्वारा जारी 2019 के वैश्विक रिपोर्ट बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआइ) से हुआ।

इस रिपोर्ट में कहा गया कि 2006 से 2016 के बीच भारत ने 27.1 करोड़ लोगों को गरीबी के दलदल से बाहर निकाला। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत बहुआयामी गरीबी के सबसे तेज उन्मूलन में 101 देशों की सूची में शीर्ष पर है। रिपोर्ट में कहा जा चुका है कि बांग्लादेश, कंबोडिया, कांगो, इथियोपिया, हैती, भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, पेरु और वियतनाम सहित 10 देशों ने सतत विकास का लक्ष्य हासिल करने में सफलता अर्जित की है। गौर करें तो इन देशों की कुल आबादी तकरीबन 2 अरब है और सभी ने गरीबी को सभी रूपों में हर जगह समाप्त करने में कारगर भूमिका निभाई है। भारत के संदर्भ में आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले सर्वे से दूसरे सर्वे के बीच 27 करोड़ गरीब ऊपर उठे हैं।

ध्यान देना होगा कि विश्व भर में गरीबी की परिभाषा और पैमाने को लेकर एक राय नहीं है। लेकिन इस रिपोर्ट में बहुआयामी गरीबी को रेखांकित करते हुए कहा गया कि गरीब सिर्फ वही नहीं है जिसकी आय बहुत कम है। गरीब वह भी है जिसकी सेहत ठीक नहीं है या उसे हिंसा के माहौल में रहना पड़ता है। रिपोर्ट में उसे भी गरीब माना गया है जिसकी काम करने की दशाएं बेहद नाजुक हैं। चूंकि इस रिपोर्ट को वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया लिहाजा इसके आंकड़ों पर संदेह नहीं किया जा सकता। गौर करें तो इस रिपोर्ट को तैयार करने में 31 न्यूनतम आय, 68 मध्यम आय और दो उच्च आय वाले 101 देशों के 1.3 अरब लोगों का अध्ययन किया गया। इनमें से दो तिहाई से अधिक अर्थात 88.6 करोड़ मध्यम आय वाले देशों के लोग हैं जबकि 44 करोड़ लोग कम आय वाले देशों के हैं। रिपोर्ट पर गौर करें तो गरीबी में कमी को लेकर हुई प्रगति का संवाहक दक्षिण एशिया को माना गया है। भारत की बात करें तो उसने न सिर्फ इस अवधि में 27 करोड़ लोगों को गरीबी की दलदल से बाहर निकाला है बल्कि गरीबी में अभाव वाले सभी दस संकेतकों में तेजी से सुधार भी किया है।

सरकार के आंकड़ों पर गौर करें तो देश की कुल 22 प्रतिशत आबादी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। इनमें 27 प्रतिशत आबादी वाले 126 जिले सबसे गरीब और सुविधाओं से वंचित हैं। इनमें अधिकतर जिले उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड राज्य के हैं। इसी तरह 14 प्रतिशत आबादी वाले 151 जिले, जो गुजरात, तमिलनाडु, पंजाब और महाराष्ट्र राज्य से ताल्लुक रखते हैं, कुछ बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन संपूर्ण रुप से मूलभूत सुविधाओं से संतृप्त नहीं हैं। 18 प्रतिशत आबादी वाले 177 जिलों को घरेलू सुविधाओं और 15 प्रतिशत आबादी वाले 127 जिलों को मध्यम रुप से मूल सुविधाओं से वंचित है। गरीबी उन्मूलन से जुड़े जानकारों का कहना है कि अगर 11.5 करोड़ लोगों को गैर कृषि क्षेत्र में रोजगार दिया जाए और खाद्य उत्पादकता मौजूदा 2.3 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 4 टन किया जाए तो गरीबी से निपटने में मदद मिलेगी। इसी तरह अगर सामाजिक सेवाओं के सुधार पर वर्ष 2022 तक 10,88,000 करोड़ रुपए खर्च किया जाए तो आय असमानता पाटने में मदद मिलेगी और 10 साल के दरम्यान 90 प्रतिशत आबादी को गरीबी के दलदल से उपर उठाया जा सकता है।


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