Saturday, July 31, 2021
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न्यायपालिका देर से हुई सक्रिय

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जिस तरह से मद्रास हाई कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग पर की गई तल्ख टिप्पणियों को मीडिया में स्थान मिला है और जनता के एक बड़े वर्ग द्वारा इनका स्वागत किया गया है इससे यह स्पष्ट होता है कि आम जन मानस भी कोविड-19 की दूसरी लहर के प्रसार के लिए चुनाव आयोग के अनुत्तरदायित्वपूर्ण आचरण को उत्तरदायी समझता है। मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री बनर्जी ने 26 अप्रैल की सुनवाई के दौरान कहा- आप (चुनाव आयोग) वह एक मात्र संस्था हैं जो इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। न्यायालय के हर आदेश के बावजूद रैलियों का आयोजन कर रही पार्टियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। संभवत: आपके चुनाव आयोग पर हत्या का आरोप लगना चाहिए। सुनवाई के दौरान एक अन्य अवसर पर उन्होंने कहा- जब इन राजनीतिक रैलियों का आयोजन हो रहा था तब क्या आप अन्य ग्रह पर थे। मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने उस बहुचर्चित प्रश्न पर भी अपनी स्पष्ट राय रखी जो आजकल बार-बार पूछा जा रहा है- इन चुनावों का आयोजन न केवल संवैधानिक बाध्यता है बल्कि यह नैतिक रूप से सही है क्योंकि आम नागरिकों को समय पर अपनी सरकार चुनने का अधिकार है।

क्या इस वैश्विक महामारी के भय से आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को निलंबित रखा जा सकता है? माननीय मुख्य न्यायाधीश ने कहा- जन स्वास्थ्य एक सर्वोच्च अधिकार है और यह क्षोभजनक है कि संवैधानिक प्राधिकारियों को इस संबंध में स्मरण दिलाना पड़ता है। जब कोई नागरिक जीवित रहेगा तब ही वह उन अधिकारों का लाभ उठा सकेगा जिनकी गारंटी कोई लोकतांत्रिक गणराज्य करता है। ङ्घस्थिति अब स्वयं को बचाने और खुद की रक्षा करने की है, बाकी सब कुछ बाद में आता है। मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का यह कथन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि सरकार का अब भी मानना है कि चुनावों के आयोजन का कोविड-19 की इस दूसरी लहर से कोई संबंध नहीं है। देश के गृह मंत्री अमित शाह ने कहा-पांच राज्यों में आए कोविड मामलों के उछाल के लिए हमें चुनावों को दोषी नहीं ठहराना चाहिए। चुनाव आवश्यक हैं और आवश्यक सावधानियों तथा सुरक्षा उपायों के साथ इनका आयोजन अवश्य होना चाहिए।

बहरहाल चुनावों की आवश्यकता के निर्धारण के आदरणीय गृह मंत्री जी के अपने पैमाने हैं तभी जम्मू-कश्मीर में चुनाव अलग-अलग कारण बताकर टाले गए हैं और वहां की जनता निर्वाचित सरकार प्राप्त करने के लोकतांत्रिक अधिकार की बाट जोह रही है, जबकि इन पांच राज्यों में स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति में चुनाव का आयोजन कर जन स्वास्थ्य को गंभीर संकट में डाला गया है।

मद्रास हाई कोर्ट के इस सख्त रवैये से बहुत ज्यादा उत्साहित होने की जरूरत नहीं है। उसकी इस कड़ी टिप्पणी के बावजूद यह सवाल अब भी अनुत्तरित ही है कि जब मद्रास हाई कोर्ट द्वारा 22 मार्च को राजनीतिक दलों एवं चुनाव आयोग से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया था कि रैलियों के दौरान लोग मास्क पहनें और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें, तब चुनाव आयोग एवं राजनीतिक पार्टियों ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया? और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह प्रश्न है कि जब बारंबार मद्रास हाई कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन हुआ तो उसने वैसा कठोर रुख क्यों न अपनाया जैसा आज दिखा रहा है जब वह कोविड प्रोटोकाल का पालन न होने पर मतगणना रोकने की बात कह रहा है।

इसी प्रकार कलकत्ता हाई कोर्ट ने 22 अप्रैल को ऐसे ही एक विषय पर सुनवाई करते हुए कहा-चुनाव आयोग कार्रवाई करने के लिए अधिकृत है किंतु वह इस कोविड काल में मतदान के दौरान क्या कर रहा है? कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा कि चुनाव आयोग का कर्त्तव्य परिपत्र जारी करना और आंतरिक बैठकें करना ही नहीं है। चुनाव आयोग ने मात्र इतना ही करके अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली है और सब कुछ जनता पर छोड़ दिया है। मद्रास हाई कोर्ट की भांति ही कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कठोर टिप्पणियां तो कीं किंतु पश्चिम बंगाल में बाकी चरणों के चुनाव एक साथ कराने या कोविड-19 की परिस्थितियां सुधरने के बाद शेष सीटों पर चुनाव कराने जैसे किसी कदम से उसने भी परहेज किया।

चुनाव आयोग को विरोधी दल शेष चरणों का चुनाव एक साथ कराने का सुझाव दे चुके थे, जिसे उसने खारिज कर दिया था। चुनाव आयोग ने भाजपा के रुख का समर्थन किया, जिसने विरोधी दलों के इस सुझाव का विरोध किया था। कलकत्ता हाईकोर्ट का तो यह मानना था कि वैश्विक महामारी के दौर में भी उपयुक्त तरीके से चुनाव का सुरक्षित संचालन कर चुनाव आयोग को एक उदाहरण प्रस्तुत करना था एवं प्रजातंत्र को आगे बढ़ाना था।
मद्रास और कलकत्ता हाई कोर्ट का यह कठोर रुख आशा से अधिक चिंता उत्पन्न करता है।

यह सख्ती तब दिखाई गई है जब चुनाव प्रक्रिया बंगाल को छोड़कर शेष राज्यों में पूर्ण हो चुकी है और बंगाल में भी अंतिम चरण में है। जब राजनीतिक दल कोविड नियमों की धज्जियां उड़ा रहे थे तो न्यायालय भी चुनाव आयोग की भांति मूकदर्शक बना हुआ था। चुनाव आयोग राजनीतिक दलों एवं राज्य शासन को पत्र लिख रहा था और न्यायालय चुनाव आयोग को निर्देश दे रहा था। एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालने की इस हास्यास्पद प्रक्रिया के दौरान चुनाव सम्पन्न होते रहे और कोविड-19 की दूसरी लहर बेलगाम होकर फैलती रही।

अब जब चुनाव हो चुके हैं तो अदालतों और चुनाव आयोग में स्वयं को निष्पक्ष और स्वतंत्र सिद्ध करने की होड़ लग रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने बंगाल में कोविड-19 प्रोटोकॉल के पालन की समीक्षा बैठक के दौरान 24 अप्रैल को कहा-हमें इस बात को लेकर चिंता है कि सार्वजनिक प्रचार के दौरान आपदा प्रबंधन कानून 2005 का क्रियान्वयन आवश्यकता के अनुसार नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी की एग्जीक्यूटिव कमेटी पर कोविड एप्रोप्रियेट बिहेवियर का पालन कराने की जिम्मेदारी है। जिले का सरकारी अमला ही चुनाव कार्यों के साथ-साथ आपदा प्रबंधन कानून के क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी है।

जब सरकारें संवेदनहीन हो जाती हैं, जब राजनीतिक दल सत्ता प्राप्ति को ही अपना चरम-परम लक्ष्य बना लेते हैं तब जनता के लिए न्यायालय अंतिम शरण स्थली होती है। कोविड-19 की इस विनाशकारी लहर के दौरान स्पष्ट कुप्रबंधन और अव्यवस्था के कारण लोगों की मृत्यु हो रही है। वे किससे गुहार लगाएं? इस संकट काल में भी न्याय किसी ईमानदार और निष्पक्ष न्यायाधीश की सांयोगिक उपस्थिति पर ही निर्भर है।


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