Friday, February 3, 2023
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गीतमाला वाले वे दिन!

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उन दिनों अमूमन अखबारों के दफ्तर में देर शाम फोन की घंटी बजती थी (तब मोबाइल नहीं जन्मा था) तो अंदेशा होता था कि ‘कुछ तो हुआ होगा।’ मसलन ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु (तड़के तीन बजे), जान कैनेडी की हत्या (आधी रात), याहया खान द्वारा भारतीय वायुसेना स्थलों पर बांग्लादेश युद्ध पर प्रथम रातवाला हवाई हमला, इत्यादि। उस रात (दिसंबर, 1966) में मुंबई ‘टाइम्स आफ इंडिया’ दफ्तर में अचानक फोन की घंटी बजी। तीसरी मंजिल के रिपोर्टर कक्ष में बैठा, मैंने फोन उठाया। कोई पूछ रहा था: ‘सिटी डायरी’ के लिए फलां कार्यक्रम भेजा था, छाप दीजिएगा।’ खोजकर मैंने उन्हें बताया कि आइटम दे दिया है।

उधर से वह व्यक्ति अपना नाम बताने ही वाला था कि बीच में मैंने टोका। कह दिया, ‘आपको कौन नहीं पहचानता? आपकी आवाज ही आपकी पहचान है।’ वे थे अमीन सयानी। उनकी दिलकश वाणी सुनकर ही मेरी स्कूली पीढ़ी वयस्क हुई थी। तभी रेडियो सीलोन पर बिनाका गीतमाला शुरू हो गई थी। बुधवार की शाम हुई कि आठ बजते बजते रेडियो से सभी कान सटाकर बैठते थे। हिंदुस्तान ठहर जाता था। ‘भाइयो और बहनो, ‘अमीन सयानी……।’ उनकी उद्घोषणा का अंदाज भी निराला था।

मानो श्रोता के सामने बैठकर संवाद कर रहे हों, बीन बजा रहे हों। उस दौर में फिल्मी गीतों की लोकप्रियता भी खूब थी। कारण था कि नवस्वतंत्र भारत सरकार की रेडियो नीति। सूचना और प्रसारण मंत्री थे उत्तर प्रदेश में बसे मराठी विप्र डा. बालकृष्ण विश्वनाथ केसकर जो शास्त्रीय संगीत को ही सब कुछ मानते थे। फिल्म संगीत को वे अपसंस्कृति समझते थे, बाजारू। वह पूर्णत: प्रतिबंधित था रेडियो पर।

डा. केसकर शास्त्रीय संगीत के पक्षकार तथा कट्टर प्रचारक रहे। उनके मददगारों में ठा. जयदेव सिंह, श्रीमती वाणीबाई राम जैसे अफसर थे। मंत्रीजी की दृढ़ मान्यता थी कि फिल्मी गानों से जनरुचि ओछी, हरजाई टाइप होती है। नतीजा वही हुआ। जिसे जितना दबाया जाता है, वह उतना ही उछलता है, रबड़ की गेंद की मानिन्द। फिल्मी म्यूजिक भी।

अत: लाजमी है कि रेडियो सीलोन का फिल्मी प्रोग्राम अपार सफलता पा गया। प्रारंभ हुआ 3 दिसंबर 1952 को, सात गानों की सीरीज का पहला शो रिले किया गया था। काफी कामयाब रहा। एक साल के भीतर अमीन सयानी के कोलाबा आफिस में हर हफ्ते 65,000 चिट्टियां आने लगीं। बाद में इस शो में गानों की संख्या सात से बढकर 16 हो गई। बुधवार को प्रसारित होने वाले इस शो के लिए पिछले शनिवार को ही रिकार्डिंग की जाती थी। सन 1952 में आई हिंदी फिल्म ‘आसमान‘ का गाना ‘पोम पोम बाजा बोले’ काफी मशहूर हुआ। इसे ओपी नय्यर द्वारा ट्यून किया गया है।

ये ‘जिंगल बेल, जिंगल बेल’ पर आधारित है। गीत माला की यही सिग्नेचर ट्यून थी। पायदानों पर गीत का स्थान तय कौन करें? इसकी पद्धति निर्धारित थी। शो में कौन से गाने जाने चाहिए? इसके लिए देशभर के प्रमुख रिकार्ड डीलरों से रिपोर्ट मांगी जाती थी।

पहले दो दशकों तक नौशाद अली, सी. रामचंद्र, हेमंत कुमार, रोशन और मदन मोहन साप्ताहिक हिट परेड में प्रमुखता से शामिल रहे। वहीं 1960 के दशक में शंकर-जयकिशन, ओपी नय्यर और एसडी बर्मन आए। फिर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी- आनंदजी और आरडी बर्मन ने उनकी जगह ले ली। प्रसिद्ध लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जोड़ी के प्यारेलाल ने कहा, ‘मैं और लक्ष्मीभाई दोनों बिनाका गीतमाला के प्रबल प्रशंसक थे। मुंबई के रिकॉर्डिंग स्टूडियो में जूनियर संगीतकार के रूप में संघर्ष करते हुए, हमने एक दिन का सपना देखा था जब हमारे गीत गीत माला चार्ट-बस्टर होंगे।’

यूं पहले दिन से ही विज्ञापनों के मार्फत रेडियो सीलोन पर धन बरसना शुरू हो गया था। उसके पूर्व तक अमीन सयानी का साप्ताहिक परिश्रमिक केवल 25 रुपए था। उस वक्त आठ आने सेर शक्कर बिकती थी। चावल एक रुपये सेर। उन्होंने वह भी जमाना देखा जब वे आकाशवाणी के हिंदी प्रभाग के लिए आडिशन देने गए थे। उनसे कहा गया कि उनके उच्चारण में अंग्रेजी और गुजराती का आभास आता है, मगर वे हतोत्साहित नहीं हुए।

उन्होंने कई विदेशी रेडियो कार्यक्रमों के लिए भी अपनी आवाज दी है। वे 50 हजार से ज्यादा कार्यक्रमों और करीब 20 हजार जिंगल कर चुके हैं। सन 1992 में उन्हें लिमका बुक आफ रिकार्ड ने ‘पर्सन आफ द ईयर’ के खिताब से नवाजा गया। उन्हें पद्मश्री से 2009 में सम्मानित किया गया। भाग्य देखिए, कभी वे गायक बनना चाहते थे लेकिन बाद में जाने-माने ब्राडकास्टर हो गए। उनकी मान्यता है कि अच्छी हिंदी बोलने के लिए थोड़ा-सा उर्दू का ज्ञान भी जरूरी है।

बालीवुड में किस्मत आजमाने से पहले अमिताभ बच्चन रेडियो उद्घोषक बनना चाहते थे। इसके लिए वह ‘आल इंडिया रेडियो’ के मुंबई के स्टूडियो में आडिशन देने भी गए थे, अमीन सयानी के पास। तब अमिताभ से मिलने का समय नहीं था क्योंकि अभिनेता ने वायस आडिशन के लिए पहले से समय नहीं लिया था। अमीन सयानी को याद कभी हुआ कि ‘जब मैं एक हफ्ते में 20 कार्यक्रम करता था तो हर दिन मेरा अधिकतर समय साउंड स्टूडियो में गुजरता था। मैं रेडियो प्रोग्रामिंग की हर प्रक्रिया में शामिल रहता था।’ सयानी याद करते हैं कि एक दिन अमिताभ बच्चन नाम का एक युवक बिना समय लिए वायस आडिशन देने आया।

मेरे पास उस पतले-दुबले व्यक्ति के लिए बिल्कुल समय नहीं था। उसने इंतजार किया और लौट गया। इसके बाद भी वह कई बार आया लेकिन मैं उससे नहीं मिल पाया और रिसेप्शनिस्ट के माध्यम से यह कहता रहा कि वह पहले समय ले, फिर आए।’

हालांकि 1970 के दशक में निजी टीवी चैनलों के आने और फिल्मी गीतों की गुणवत्ता में लगातार गिरावट के कारण गीतमाला ने अपनी चमक खोनी शुरू कर दी थी। आज जो विविध भारती चमक रही है, उसमें भी अमीन सयानी को ही श्रेय देना चाहिए। आकाशवाणी के संचालक समझ गए कि फिल्मी गीत धनोपार्जन का अजेय स्रोत हैं। उसे परिमार्जित कर चलाया गया। आज वह शीर्ष पर है। उम्र के तकाजे से सयानी साहब पर भी सीमाएं आ गई पर उन्होंने राष्ट्र के जनजीवन में अपार अमरत्व तो कायम कर ही दिया है।


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