Thursday, May 14, 2026
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वीर एकलव्य, अंगूठा और गुरु द्रोण

SANSKAAR

 


हमारे देश ही नहीं अपितु समस्त विश्व में गुरु-शिष्य परम्परा किसी न किसी रूप में आदि काल से सर्वदा विद्यमान है। गुरु से सदैव सर्वगुण संपन्न होने की अपेक्ष्त्र की जाती है। संत कबीर ने शिष्य को मिट्टी का कच्चा घड़ा तथा गुरु को कुम्भकार बताया। इतना ही नहीं, गुरु को ब्रह्मा, विष्णु व महेश के समतुल्य भी कहा।

ईश्वर की अपेक्ष्त्र गुरु को अग्रपूज्य भी बताया। जायसी ने पद्मावत में ‘गुरु सूआ जेहि पंथ दिखावा। बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा।।‘ तक लिख डाला। जीवन यापन के हर पेशे में गुरु का सर्वाधिक महत्व है।

प्राय: शिष्यों के चलते कई गुरु सुविख्यात हुए और अब भी होते हैं इसके विपरीत महाभारत काल के गुरु द्रोण को शिष्य एकलव्य के कारण सर्वदा कड़वे प्रश्न के घेरे में रहना पड़ता था।

महाभारत न केवल एक कुल के दो पक्षों का महा संग्राम था अपितु गुरु-शिष्य के विविध भूमिकाओं का भी साक्षी है। गुरुकुल या रंगभूमि ही नहीं बल्कि युद्धभूमि के परस्पर द्वन्द्व का भी भुक्तभोगी है। असीम और अद्वितीय गुरुदक्षिण्त्र का भी सूचक है।

महाभारत की कथा में देवगुरु भगवान बृहस्पति, भगवान परशुराम, गुरु संदीपनी, गुरु द्रोण्त्रचार्य, गुरु कृपाचार्य आदि परम गुरुओं या उनके शिष्यों का उल्लेखनीय स्थान है।

एक शरणर्थी राजा को बचाने में गुरु परशुराम और उनके शिष्य देवव्रत आमने-सामने आ गए। ब्राह्मणत्व के महत्व को बचाते हुए गुरु परशुराम को पीछे हटना पड़ा। कदाचित तभी से गुरु कपटी होने लगे।

उनका शिष्य उनको चुनौती न दे सके, इस हेतु विद्या चोरी की गलत धारणा का सूत्रपात हुआ। गुरु परशुराम और शिष्य कर्ण की कथा भी इससे पृथक नहीं रही।

गुरु द्रोण और शिष्य एकलव्य की दक्षिण की कहानी गुरु के चरित्र पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। एकलव्य को सर्वश्रेष्ठ शिष्य साबित करने की कहानी है। गुरु द्रोण के अर्जुन मोह और क्रूरता की कहानी है।

गुरु-शिष्य के रिश्ते में अविश्वास और दुरुपयोग की कहानी है। छल, छद्म और कपट को पैदा करने वाली कहानी है। नए दृृष्टिकोण से सोचने और समझने की कहानी है।

गुरु द्रोण ने गुरु दक्षिणा मांगी और शिष्य एकलव्य ने सहर्ष दे दी। यहीं से वीर एकलव्य की गिनती महानतम शिष्यों में होने लगी। इसके विपरीत गुरु द्रोण पांच सहस्र वर्ष बाद भी असम्मान से उबर नहीं पाए। शयद एकलव्य के त्याग के समक्ष गुरु द्रोण का पक्ष नगण्य सा लगा तभी तो किसी ने गुरु की ओर से पक्ष रखने की कोशिश नहीं की।

महाभारत विजेता अर्जुन का वीरत्व भी एकलव्य की दक्षिण्त्र के समक्ष फीका हो जाता है या दूसरे शब्दों में कहें तो ऋणी हो जाता है। वैकल्पिक हो जाता है।अतएव अब इस प्रसंग पर विचार करना आवश्यक हो जाता है।

प्रयाग के पास श्रृंगबेर राज्य था जिसका शसक हिरण्यधनु नामक एक निषाद था। निषाद राज हिरण्यधनु का एक पुत्र था जिसका नाम अभिद्युम्न था। कुछ लोगों के अनुसार कृष्ण के चाचा का पुष्ठाा अभिद्युम्न था जिसे निषाद राज ने गोद लिया था। यह बालक बहुत विलक्षण था।

बचपन में ही धनुष चलाने की निपुणता देखकर ऋषि पुलक ने सलाह दी कि इसे धनुर्विद्या के लिए गुरु द्रोण के आश्रम में ले जाना चाहिए। हिरण्यधनु अपने पुत्र अभिद्युम्न के साथ पहचान छुपाकर हस्तिनापुर आया तथा गुरुद्रोण से मिला और शिष्य बनाने हेतु निवेदन किया।

गुरु द्रोण ने कुरु वंश का गुरु होने के कारण अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। हिरण्यधनु वापस लौट गए किंतु अभिद्युम्न ने गुरु द्रोण के आश्रम में सेवक बनने की आज्ञा प्राप्त कर ली। गुरु के आश्रम से दूर एक कुटी बनाकर अभिद्युम्न रहने लगा। उस परिक्षेत्र में आदिवासी भीलों की संख्या बहुतायत थी जिनके रहन- सहन का एकलव्य पर बहुत असर पड़ा।

गुरु द्रोण के आश्रम में कुरुवंशीय राजकुमार प्रशिक्षण लेते और वह पैनी नजरों से देखकर समझने का प्रयास करता। शम के समय आश्रम की सफाई करता और पुराने बाणों को ले जाकर अकेले ही धनुर्विद्या का अभ्यास करता।

एक बार गुरु द्रोण के साथ उनके शिष्यगण आखेट करने जा रहे थे। उनका कुत्ता सबसे आगे चलते हुए बहुत दूर निकल गया था। फिर ऐसा हुआ कि वह मुंह में बाण भरे बहुत तेजी से वापस आया। उसकी दश देखकर राजकुमारों को बहुत क्रोध आया और अर्जुन तथा गुरु द्रोण को असीम आश्चर्य।

अनायास ही गुरु के मुख से ‘शब्दभेदी’ शब्द निकला और सबके मन में महाराज दशरथ की धनुर्विद्या का स्मरण हो आया। बाण निकालकर वे लोग कुत्ते के साथ उसी दिश्त्र में गए। वहां एक धनुर्धर अभ्यास कर रहा था। उसकी धनुर्विद्या अद्भुत थी। लोगों के मन में विचारों का ज्वारा-भाटा आना स्वाभाविक था।

अभिद्युम्न ने गुरु द्रोण का अभिवादन किया। कोई मानने को तैयार नहीं था कि यह कोई भील कुमार है। अर्जुन के मौन सवाल को गुरु द्रोण ने अभिद्युम्न के समक्ष रखा, ‘वत्स, तुम्हारे गुरु का नाम क्या है?’ ‘गुरु द्रोणाचार्य’ अभिद्युम्न का प्रत्युत्तर सबके लिए आश्चर्यजनक था।

गुरु द्रोण ने जोर देकर कहा, ‘मैंने तो तुम्हें शिष्य बनाया नहीं, धनुर्विद्या सिखाई नही….’। अभिद्युम्न ने मिट्टी से बनी एक प्रतिमा की ओर विनम्र इशारा किया जो गुरु द्रोण की थी। ‘मै एकाग्रचित्त होकर आपकी प्रतिमा को देखकर ही अभ्यास करता हूं। मुझे आभास होता है कि आप मेरे सभी सवालों का जवाब दे रहे हैं, मुझे सिखा रहे हैं।’ अभिद्युम्न ने बताया।

संतुष्ट न होते हुए गुरु ने उस अद्वितीय शिष्य का पूरा परिचय पूछा। जब अभिद्युम्न ने निषादराज हिरण्यधनु को अपना पिता बताया तो गुरु द्रोण के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई। गुरु द्रोण के चिंताग्रस्त होने के कई कारण थे।

पहला कारण यह कि अभिद्युम्न जिसकी एकाग्रता देखकर एकलव्य नाम पड़ा था, के पिता निषादराज हिरण्यधनु मगध नरेश जरासंध के मित्र और सहयोगी थे। जरासंध इनके ही सहयोग से मथुरा पर कई बार आक्रमण कर चुका था। प्रजा त्रस्त थी। मौत का तांडव अनवरत जारी था।

एकलव्य भी निकट भविष्य में जरासंध का सहयोगी बनता दीख रहा था। दूसरा कारण यह कि जो बालक कुत्ते की नैसर्गिक स्वतंत्रता भौंकने से क्रुद्ध होकर बाण चला सकता है वह धनुर्विद्या का दुरुपयोग कर मानवता के लिए खतरा भी बन सकता है। तीसरा कारण यह कि गुरु द्रोण राजकुमार अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन दे चुके थे जिस राह में एकलव्य बहुत बड़ी चुनौती बनकर खड़ा था।

गुरु द्रोण ने ऐसे निर्दयी, निरंकुश और निपुण तथाकथित शिष्य को मानवता रक्षार्थ नियंत्रित करने की ठान ली। उन्होंने गुरु की गुरुता पर अमिट लांछन लगना स्वीकार किया।

एकलव्य से गुरु ने पूछा कि गुरु तो बना लिया, गुरु दक्षिणा?‘ एकलव्य सहर्ष तैयार हो गया। गुरु ने गहरी सांस लेते हुए अपने दिल पर कलंक का पत्थर रखकर मांग रखी, अपना दाहिना अंगूठा दे दो मुझे।’

एकलव्य फौरन कटार निकालकर अपने अंगूठे पर रखा कि गुरु ने उसे रोककर समझाया, ‘वत्स, अंगूठा काटने की आवश्यकता नहीं है। यह अंगूठा तुम्हारे पास रहकर भी मेरा हो गया है। अब से तुम इसका उपयोग नहीं करोगे।’

एकलव्य अद्भुत दक्षिणा देकर खुश था और गुरु द्रोण मानवता के पक्ष में स्वयं के सम्मान को खो चुके थे। एकलव्य की गुरुभक्ति के समक्ष वे ग्लानि से भरे जा रहे थे।

कदाचित ऐसी ही स्थिति शिष्य कर्ण के समक्ष गुरु परशुराम की रही होगी। स्तब्धता भंग करते हुए गुरु द्रोण अपने अद्वितीय शिष्य एकलव्य को धनुर्विद्या में तर्जनी और मध्यमा अंगुलियों के प्रयोग की विधि समझककर अपने शिष्यों के साथ आश्रम लौट आए। सम्भवत: गुरु द्रोण द्वारा धनुर्विद्या के क्षेत्र में अंगूठा विहीन तीरंदाजी का यह प्रथम सूत्रपात था। आज की तीरंदाजी प्रतिस्पर्धा अंगूठा विहीन ही होती है।


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