नारी! तुम केवल श्रद्धा हो/विश्वास रजत नग पगतल में/पीयूष स्रोत सी बहा करो/जीवन के सुंदर समतल में। महान छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में नारी को श्रद्धा और विश्वास की प्रतिमूर्ति बताते हुए जीवन के समतल में अमृत धार सी बहते रहने की इच्छा व्यक्त की थी। इधर ठेठ पुरुषप्रधान समाज में नारी को श्रद्धा और विश्वास के रूप में कब से मान्यता मिली ये तो मुझे ठीक से पता नहीं लेकिन जबसे नेताओं के लिए नारी चुनावी नारा बनी, लगा प्रसाद जी की नारी के प्रति इस मान्यता को सरकार ने मान्यता दे दी। किसी वस्तु,व्यक्ति या विचार को एक बार सरकारी मान्यता मिल जाए तो फिर रह ही क्या जाता है सिवाय मान लेने का एक समय था जब नारी के अधिकार अत्यंत सीमित थे।
यहां तक कि उसे स्वयं का घर और वर चुनने का भी अधिकार नहीं था, अलबत्ता राजकुमारियों को स्वयंवर चुनने की आजादी जरूर थी, मगर शर्त क्या रहेगी ये राजा-रानी नहीं सिर्फ राजा ही तय करते थे। होता यह कि जो सिकंदर शर्त जीतता वो फटदीनी राजकुमारी का मुकद्दर हो जाता। अब वर स्वरूप उसे मिलर मिलें या रबाडा उसकी वो जाने! बताइए ठंडी में पसीना चले, जिगर में आग जले टाइप डैडी से पूछकर … ये स्वयंवर भी कोई स्वयंवर हुआ? खुश होइए कि अब ऐसा नहीं है। जबसे देश में लोकतंत्र आया नारी को स्वयं के वर से कहीं आगे जाकर सरकार चुनने का अधिकार मिल गया जैसा नरों को मिला, ‘किन-नरों’ को मिला।
गृहस्थ जीवन में अर्धांगिनी का दर्जा प्राप्त नारी अब देश की आधी आबादी कही जाने लगी ह। ये बात और है कि सदा से सदा के लिए पुत्र मोह में मारी जाती रही उस नारी की असल आबादी फिलवक्त कितनी है, जनगणना सम्पन्न होने के बाद ही पता चलेगा। बहरहाल, जब कुल आबादी की आधी नारी हो तो क्यों न उस नारी की शक्ति का ही वंदन करते हुए जोरदार अभिनंदन किया जाए? लोकतंत्र में मतदाता को खुलेआम खरीदने की मनाही है लेकिन खुलेआम मजबूत करने की मनाही नहीं। अबके मतदाता खाने-पीने से नहीं ‘सम्मान निधि’ बांटने से मजबूर होते हैं। माननीयों की हार्दिक इच्छा है देश में सम्मान निधि की इतनी नदियां बहा दी जाएं कि हर मतदाता किसी न किसी बहाने इनमें स्नान कर खुद को सम्मानित महसूस करें।
स्मार्ट स्टडी का एक तरीका यह भी है कि जब तैंतीस फीसदी अंकों से इम्तिहान पास होना है तो शत-प्रतिशत पढ़ने के बरअक्स आधा पाठ्यक्रम ही अच्छे से तैयार कर लिया जाए। ये बात सियासतदा भी समझ गए हैं। उन्हें पता है एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाए। चुनांचे धर्म, वर्ग, जाति और लिंग को लक्ष्य कर सभी दल एक को साधने की साधना में लगे रहते हैं। भांति-भांति के धर्मगुरु, समाज अध्यक्ष, यूनियन अध्यक्ष…रहा सवाल नारी का तो उसे साध लिया तो नर का क्या है वह तो…बीते सालों में नारी के प्रति बढ़ी श्रद्धा से उनके प्रति पक्का विश्वास हो गया है कि नारी कृतघ्न नहीं हो सकती।

