जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: शहर के अस्पतालों से लेकर बड़े शॉपिंग कॉम्पलेक्स, दुकान व आवासीय भवन तक अग्निकांड की जद में हैं। दरअसल, सीएफओ आॅफिस से सिर्फ नोटिस देने के नाम पर खानापूर्ति की जाती है। नोटिस देने के बाद भी व्यापारिक प्रतिष्ठानों के लिए एनओसी नहीं ली गई। हैरानी तो शहर के अस्पतालों को लेकर है।
हर समय मरीजों और तीमारदारों से भरे रहने वाले अस्पतालों में 50 फीसदी ही एनओसी ले रखी है। एनओसी देने वाला दमकल विभाग भी इस तरफ से आंखें मूंदे हुए हैं। कानूनी प्रक्रिया एक के खिलाफ भी नहीं की जा रही है।

शहर में बहुत से कॉमर्शियल इमारतों में व्यापार बिना फायर लाइसेंस के चल रहा है। फायर लाइसेंस फायर विभाग द्वारा उन संस्थान और इमारतों को दिया जाता हैं, जिनमें आग लगने पर लोगों के बचकर निकलने की पूर्ण व्यवस्था होती है।
भवन के अंदर से बाहर आने के लिए कम से कम दो निकासी द्वार होने अनिवार्य होते हैं, जिसमें प्रवेश ओर निकासी दोनों द्वार मान्य होते हैं। वहीं, शहर में अनेक सिनेमाघर, स्कूल, इंस्टीट्यूट आदि बिना फायर लाइसेंस के चल रहे हैं।
इस विषय को लेकर दैनिक जनवाणी ने हाल ही में सिंगल विंडो सिनेमा के बंद होने के कारण को भी स्पष्ट किया। सरकार द्वारा नए नियम व्यापारियों के गले कि हड्डी बने हुए हैं। वहीं, देखा जाता है कि अभी तक पुराने नियम ही ठीक से लागू नहीं किए गए हैं और नए नियम लाद दिए गए हैं।

अधिकारी लापरवाह बने हुए हैं। कागजी घोड़े दौड़ाये जा रहे हैं। धरातल पर काम ही नहीं होता है। शहर में बड़ी तादाद में नर्सिंग होम और अन्य प्रतिष्ठान बिना एनओसी के संचालित हो रहे हैं, मगर फिर भी सीएफओ चुप्पी साधे बैठे हैं। सीएफओ इनके खिलाफ अभियान क्यों नहीं चला रहे हैं, यह तो वहीं बता सकते हैं, लेकिन दमकल विभाग की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
क्यों जरूरी है फायर लाइसेंस?
गर्मी में आग लगाने की संभावनाएं ज्यादा रहती है। यही कारण है कि सरकार फायर लाइसेंस लेने के लिए कहती है। सरकार द्वारा लाइसेंस को देने के लिए कोई धनराशि नहीं वसूली जाती है। इस लाइसेंस के जारी होने में 20-25 दिन का समय लगता है।
सरकार का इस लाइसेंस को लेकर एक ही उद्देश्य है कि भवन स्वामी भवन में आग न लगने की सारी सावधानी बरतें और आग लगने के दौरान सुरक्षित निकला जा सकें। भवन में आग लगने के कारण मानव की गलती, आग उत्पन्न करने वाले वस्तुओं का लापरवाही से प्रयोग, शार्ट सर्किट आदि होती है।
फायर लाइसेंस को रिन्यू होने के लिए भी 20-25 दिन का समय लगता है। सात दिन तक रिन्यू न होने पर कोई जुर्माना नहीं वसूला जाता। वहीं, सात से 15 दिन तक न होने पर पांच रुपये प्रतिदिन और 15 दिन से ज्यादा होने पर 15 रुपये प्रतिदिन चार्ज किए जाते हैं।
कार्रवाई नहीं
स्थिति ये है कि सीएफओ ऑफिस से फायर एनओसी नहीं लेने पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती। शहर की पार्किंग का मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है, इसको लेकर अधिकारी अब नींद से जागे हैं। अग्निकांड को लेकर कब नींद टूटेगी, जब कोई बड़ा अग्निकांड शहर में घटित हो जाएगा।
सवाल ये भी
अवैध कॉम्प्लेक्स में कैसे होंगे इंतजाम?
शहर में एमडीए ने जो सर्वे किया है, उसमें 500 से ज्यादा अवैध कॉम्प्लेक्स का निर्माण होना बताया गया है, जिसमें पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। यही नहीं, अवैध कॉम्प्लेक्स को तो एनओसी दी ही नहीं जा सकती।
एमडीए से जब मानचित्र ही स्वीकृत नहीं है तो फिर फायर की एनओसी कैसे दी जा सकती है? ये बड़ा सवाल है। इन कॉम्प्लेक्स में किसी तरह के सुरक्षा इंतजाम नहीं है। इसको लेकर सरकारी विभागों को कदम उठाये जाने चाहिए।
कार्रवाई हो तो बढ़े भय
शहर में जो बिना एनओसी के अस्पताल और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बने हुए हैं, उन पर कार्रवाई की जाए तो निश्चित रूप से भय बढ़ेगा, लेकिन यहां तो दमकल विभाग की तरफ से कोई कार्रवाई ही नहीं की जाती। सिर्फ सेटिंग-गेटिंग का खेल चलता रहता है। ऐसे हादसे कैसे रुकेंगे?

