Wednesday, August 5, 2026
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क्या राष्ट्रपति ने तोड़ी परंपरा?

SAMVAD

 


shalini koshikदेश में 18 वीं लोकसभा गठित होने जा रही है। भारतीय परंपरा के अनुसार जब भी कोई नई लोकसभा गठित होती है तो संसद के निचले सदन अर्थात लोकसभा में सबसे लम्बा समय गुजारने वाले सदस्य या निर्वाचित सबसे वरिष्ठ सदस्य को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया जाता है। संसदीय मामलों के मंत्रालय के माध्यम से सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन प्रोटेम स्पीकर का नाम राष्ट्रपति के पास भेजता है। इसके बाद राष्ट्रपति प्रोटेम स्पीकर को नियुक्त करते रहे हैं, प्रोटेम स्पीकर नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाते हैं। नए सांसदों को शपथ दिलाने में प्रोटेम स्पीकर की सहायता के लिए सरकार दो-तीन नामों की सिफारिश करती है। करीब दो दिनों तक सदस्यों को शपथ दिलाने का काम चलता है और इसके बाद सदस्य अपने लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। इस पुरानी परंपरा के अनुसार कांग्रेस के आठ बार के सांसद कोडिकुनिल सुरेश को 18वीं लोकसभा में प्रोटेम स्पीकर चुना जाना चाहिए था, किंतु कटक से भाजपा सांसद भतृहरि महताब जो कांग्रेस पार्टी के सांसद के सुरेश से एक बार कम सात बार के सांसद हैं, इसलिए वरिष्ठता में उनसे कम हैं, को लोकसभा के अध्यक्ष का चुनाव होने तक पीठासीन अधिकारी के रूप में कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 95 (1) के तहत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा अस्थायी अध्यक्ष (प्रोटेम) नियुक्त किया गया है।

आठ बार के सांसद, 29 वर्षों से संसद की सेवा करने वाले कोडिकुन्नील सुरेश 18 वीं लोकसभा में प्रोटेम स्पीकर पद के अधिकारी थे। और अनुच्छेद 95 (1) कहता है कि जब अध्यक्ष का पद रिक्त है, तो उस पद के कर्तव्यों का पालन उपसभापति द्वारा किया जाएगा या यदि उपसभापति का पद भी रिक्त है, तो लोकसभा के ऐसे सदस्य द्वारा किया जाएगा, जिसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे। इसलिए यह स्पष्ट है कि भारतीय संविधान अनुच्छेद 95(1) के माध्यम से राष्ट्रपति को स्वविवेक प्रयोग का अधिकार देता है, किंतु भारतीय संविधान द्वारा इतनी शक्तियों के देने के बाद भी राष्ट्रपति द्वारा रबड़ स्टैंप की तरह ही काम किया गया है। भारतीय संदर्भ में राष्ट्रपति की स्थिति को ‘रबड़ स्टैंप’ कहा जाता है। क्यों कहा जाता है ये विचारणीय विषय है। भारत के संविधान में राष्ट्रपति को आपातकाल में कुछ विशेष शक्तियों के अलावा कोई भी कार्यकारी शक्ति प्रदान नहीं की गई है। सारी कार्यकारी शक्तियां मंत्रिमंडल और प्रधानमंत्री के नियंत्रण में होती हैं और मंत्रिमंडल की अनुसंशा के अनुसार राष्ट्रपति को चलना उनकी बाध्यता है इसलिए राष्ट्रपति को रबर स्टांप कहे जाने की धारणा को बल मिलता है।

पिछले राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के साझा उम्मीदवार यशवंत सिन्हा ने भी इस संदर्भ में कहा, ‘सोचने और बोलने वाले व्यक्ति को राष्ट्रपति भवन का निवासी होना चाहिए, न कि रबर स्टाम्प को, भारत को एक ऐसे राष्ट्रपति की जरूरत है जो संविधान के निष्पक्ष संरक्षक के रूप में काम करे, न कि सरकार के लिए रबर स्टांप के रूप में। राष्ट्रपति के पास अपना दिमाग होना चाहिए और जब भी गणतंत्र की कार्यपालिका या अन्य संस्थाएं संवैधानिक सिद्धांतों से विचलित हों, तो उसे बिना किसी डर या पक्षपात के, ईमानदारी से इसका इस्तेमाल करना चाहिए।’

एक तरह से सारी शक्तियां ही राष्ट्रपति में निहित हैं, वहीं दूसरी तरफ कोई शक्ति नहीं है। भारत में कोई भी विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से ही कानून बनता है। राष्ट्रपति किसी भी विधेयक पर हस्ताक्षर से पहले एक बार संशोधन के लिए वापस भेज सकता है, किंतु अगर संसद दोबारा वहीं कानून उन्हें भेजती है तो राष्ट्रपति को हस्ताक्षर करना होगा। 24वें संविधान संशोधन अधिनियम 1971 ने संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति को अपनी मंजूरी देना बाध्यकारी बना दिया है, लेकिन इसी से उनके पास एक अधिकार आ जाता है कि वो उसको वापस न भेज कर अपने पास ही रख लें। इसे जेबी वीटो या पॉकेट वीटो कहते हैं।

जब केआर नारायणन राष्ट्रपति बने थे, तब उन्होंने कहा था कि वे रबर स्टाम्प और अमेरिकी राष्टÑपति के बीच की एक कड़ी की तरह कार्यशील राष्ट्रपति बनना चाहेंगे। उन्होंने यह किया भी और कारगिल युद्ध के समय वाजपेयी को कहा कि लोकसभा न होने पर भी राजयसभा की बैठक लेकर कारगिल युद्ध पर निर्णय लें। आॅफिस आॅफ प्रोफिट के मामले में एपीजे अब्दुल कलाम ने बिल को वापस लौटा दिया था। केआर नारायणन राष्ट्रपति थे और इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और रोमेश भंडारी राज्यपाल। बसपा प्रमुख मायावती ने भाजपा से समर्थन वापस वापस ले लिया। इस तरह कल्याण सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को सदन में बहुमत साबित करने के लिए 48 घंटे का समय दिया। कल्याण सिंह ने सदन में बहमुत साबित कर दिया। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि कल्याण सिंह ने जोड़-तोड़ तरीकों का प्रयोग किया। प्रधानमंत्री गुजराल ने राज्यपाल की सिफारिश पर उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने का प्रस्ताव राष्ट्रपति केआर नारायणन के पास भेजा। लेकिन राष्ट्रपति नारायणन ने इसे वापस कर दिया।

इसी तरह बिहार में उन दिनों राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं और सुंदर सिंह भंडारी राज्यपाल थे। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। राबड़ी देवी के मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार में आपराधिक घटनाएं अधिक हो रही थीं। इसे लेकर राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी ने केंद्र सरकार के पास राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश भेज दी। राष्ट्रपति केआर नारायणन ने केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव को वापस कर दिया। उन्होंने भाजपा शासित प्रदेशों में हो रहे अपराध और बिहार के अपराध पर एक रिपोर्ट तैयार की। आंकड़ों के मुताबिक, भाजपा शासित प्रदेशों में अपराध की दर बिहार से अधिक थी। इसलिए राष्ट्रपति केआर नारायणन ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी।

हमारे देश का राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रधान होता है और कार्यपालिका की जितनी भी शक्तियां होती हैं, वे सभी राष्ट्रपति में निहित होती हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर शक्तियों का उपयोग राष्ट्रपति नहीं करते हैं, बल्कि भारत के प्रधानमंत्री और उनकी मंत्री परिषद के द्वारा इनमें से अधिकतर शक्तियों का उपयोग किया जाता है, लेकिन इसके बावजूद भी राष्ट्रपति के पास कुछ अपनी शक्तियां होती हैं जो राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करती हैं और इसके लिए उन्हें कोई सलाह नहीं दे सकता। जैसे कि अगर लोकसभा में किसी राजनीतिक दल या गठबंधन को बहुमत प्राप्त न होने पर राष्ट्रपति अपने विवेक के अनुसार सबसे बड़ी पार्टी या सबसे बड़े गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं और इसी तरह से प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति में भी भारत के राष्ट्रपति द्वारा स्वविवेक का इस्तेमाल कर लोकसभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य (सबसे लम्बे समय तक सांसद रहने के आधार पर) की नियुक्ति इस पद पर की जाती रही, जो धीरे-धीरे एक परंपरा बन गई। ऐसे में निश्चित रूप से भतृहरि महताब के नाम का प्रस्ताव मौजूदा सत्तारुढ़ पार्टी/गठबंधन एनडीए या बीजेपी की ओर से गया होगा, जिसे माननीय राष्ट्रपति द्वारा प्रोटेम स्पीकर नियुक्त कर भारतीय परंपराओं को तोड़ गया है, जबकि यहां उन्हें अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए लोकसभा सदस्य की वरिष्ठता को सम्मान देना चाहिए था।


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