
एक बार की बात है। पिता ने पुत्र से कहा, ‘तुम पोस्ट आॅफिस से रोज पैसे देकर पोस्टकार्ड लाते हो। तुम्हारी विशेषता का तब पता चले, जब तुम बिना पैसे दिए पोस्टकार्ड लाओ।’ पुत्र को पिता की यह बात बड़ी अटपटी लगी, लेकिन वह फिर भी पोस्ट आॅफिस गया और एक पोस्टकार्ड ले आया। पिता ने कहा, ‘अरे! यह क्या उठा लाए, मैं इसका कैसे इस्तेमाल कर सकता हूं, इस पर तो पहले से ही लिखा हुआ है।’ पुत्र भी कम नहीं था। उसने पिता की ही भाषा में जवाब देते हुए कहा, ‘पिताजी! खाली पोस्टकार्ड पर सभी लिखते हैं।
लिखे हुए पोस्टकार्ड पर लिखें, तब आपकी विशेषता है।’ पिता भी सोच में पड़ गए कि पुत्र सही कह रहा है। कहने का अर्थ यह है कि बिना पैसे का पोस्टकार्ड लाना और लिखे पर लिखना-दोनों समस्याएं हैं। हमारे सामने भी यही समस्या है। यह कर्म का पोस्टकार्ड इतना लिखा हुआ है कि उस पर लिख पाना समस्या है। बिना पैसे का पोस्टकार्ड मिल जाए तो भी उस पर लिखना आश्चर्य जैसा है।
ऐसा हम कर पाएं तो आश्चर्य हो सकता है और ऐसा कभी-कभी किया जा सकता है। कुछ कर्म ऐसे होते हैं, जो बहुत परिपक्व और गाढ़े बंधन वाले होते हैं। तीव्र आसक्ति के साथ जो बंधन होता है, उसे कमजोर नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में झेलने की क्षमता को बढ़ाया भी जा सकता है। कर्मफल को झेल सकें, यह बहुत बड़ी बात है। बहुत मुश्किल होता है झेलना। जीवन में ऐसी स्थितियां आ जाती हैं, जिन्हें वर्षों तक बदला नहीं जा सकता।
प्रिय का वियोग हो गया, व्यक्ति उसे झेल नहीं सकता। अप्रिय का संयोग हो गया, उसे सहन करना कितना कठिन होता है। इन स्थितियों को सह सकें, वैसी शक्ति पैदा हो जाए तो इसे आश्चर्य मानना चाहिए। लेकिन मानव की प्रकृति ऐसी है कि उसमें वक्त के साथ पीड़ा भूलने की शक्ति आ ही जाती है।


