
सॉफ्टलाइनर यानी उदारवादी माने जाने वाले सीताराम येचुरी वामपंथी दलों के मोर्चे की सबसे बड़ी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की केरल के कन्नूर में सम्पन्न हुई तेईसवीं पार्टी कांग्रेस में लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए महासचिव चुन लिए गए हैं तो बहुत स्वाभाविक है कि वामदलों की सही-गलत रीति-नीति और बढ़ते-घटते प्रभावों से जुड़े वे सारे प्रश्न एक बार फिर पूछे जाने लगें जो पश्चिम बंगाल व त्रिपुरा जैसे उनके गढ़ों के ढहने और येचुरी के पहली बार महासचिव बनने से पहले से पूछे जाते रहे हैं। इन प्रश्नों में सबसे बड़ा तो निश्चित रूप से यही है कि चुनाव नतीजों के लिहाज से वामपंथी दल लगातार पराभव की ओर क्यों जा रहे हैं? और क्यों केरल के गत विधानसभा चुनाव में उनके मोर्चे की सत्ता में वापसी के बावजूद उनके विरोधी कह रहे हैं कि आगे चलकर वे विलोपीकरण के शिकार हो जाएंगे या सिर्फ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसी जगहों पर पाये जाएंगे?
इससे भी बड़ा सवाल यह है कि देश के हिंदी प्रदेश में वाम दलों की प्रतीकात्मक उपस्थिति भी क्यों मुश्किल हो चली है, जिसे देश का हृदय प्रदेश कहा जाता है और जिसकी जमीन को वे एक समय अपने लिए बेहद अनुकूल और उर्वर मानते थे? क्यों यह उम्मीद भी लगातार नाउम्मीद होती चली आ रही है कि कौन जाने अपने गढ़ खो देने के बाद ही वे अपनी संभावनाओं के देशव्यापी विस्तार के लिए खुलकर खेलने का मन बनाएं? आज की तारीख में, जब देश हिंदू साम्प्रदायिकतावादियों के डैनों में बुरी तरह फड़फड़ा रहा है, वाम दलों के लिए यह विस्तार उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न क्यों नहीं होना चाहिए?
यों, येचुरी अपने पहले दो कार्यकालों में अपनी नरमलाइन के बावजूद वामपंथ के जनाधार में पहले से जारी छीजन को रोकने ओर इन प्रश्नों को संबोधित करने में जिस तरह नाकामयाब रहे हैं, उससे लगता नहीं कि उनके नए कार्यकाल में इनके सही उत्तर हासिल हो पाएंगे। वाम दलों के लिए इन सवालों के जवाब इसलिए भी कठिन हो चले हैं कि वे संसदीय कहें अथवा चुनावी राजनीति में उतरे तो उसे अपनी क्रांतिकामना के लिए इस्तेमाल करने के मंसूबे से थे, मगर समय के साथ खुद उसके हाथों इस्तेमाल होकर रह गए हैं। वे आजादी के बाद विकसित अपनी वह छवि भी नहीं बचा पाए हैं, जिसमें उन्हें न सिर्फ सत्तारूढ़ कांग्रेस बल्कि प्राय: सारी मध्यवर्गीय पार्टियों का सबसे प्रतिबद्ध वैचारिक प्रतिपक्ष माना जाता था।
स्थितियों और परिस्थितियों के आकलन में उन्होंने लगातार गलतियां कीं-आजादी के पहले से लेकर आजादी के बाद तक। मिसाल के लिए अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के इस निर्देश पर अमल के बजाय कि उसे पूरी शक्ति से ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ना चाहिए, लगातार ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के एजेंडे पर चलती रही, जिसके फलस्वरूप स्वतंत्रता संघर्ष में अपनी भूमिका को तार्किक परिणति नहीं दे सकी।
महात्मा गांधी, बाबासाहब आंबेडकर, सुभाषचंद्र बोस और यहां तक कि सरदार भगत सिंह जैसे उस संघर्ष के नायकों के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन में भी उसने बहुत देरी की। आजादी के बाद माकपा को ज्योति बसु के रूप में देश को पहला वामपंथी प्रधानमंत्री देने का अवसर हाथ लगा तो उसने साफ इनकार कर दिया। तब वामदलों के विरोधियों व शुभचिंतकों दोनों को कहना पड़ा कि वामदलों की ट्रेन छूट गई है। ज्योति दा को भी बाद में इसे हिमालय जैसी भूल बताना पड़ा।
यह भी वामपंथ द्वारा स्थितियों के गलत आकलन के कारण ही हुआ कि जब उन्हें राजीव गांधी व मनमोहन सिंह प्रवर्तित नई आर्थिक नीतियों से लड़ना चाहिए था, उन्होंने अपनी सारी शक्ति उस सांप्रदायिकता से लड़ने में ही लगा दी जो जनविरोधी आर्थिक नीतियों का ही उत्पाद थी और इस अर्थनीति के साथ ही स्वत: खत्म हो जाती।
क्या आश्चर्य कि आज नई अर्थनीति और सांप्रदायिकता दोनों ‘अजेय’ हो गई हैं और वामपंथी दल मनमोहन के राज में अमेरिका से परमाणु करार के विरोध में सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद खुद को हुए नुकसान की अब तक भरपाई नहीं कर सका है। वामपंथी ऐसी भूलें नहीं करते तो आज प्राय: सारी मध्यवर्गी पार्टियों से निराश देश उन्हें खासी उम्मीद के साथ निहारता। वे कह पाने की स्थिति में होते कि अब हमारी बारी है।
एक ओर नवपूंजीवादी नीतियां बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता के साथ मिलकर देश को निगलने पर आमादा हैं और दूसरी ओर उनसे पूरे दम-खम के साथ दो-दो हाथ करने के बजाय संघर्षविमुख वाम दलों ने अपनी क्रांतिकामना को भी कर्मकांड बना डाला है-देश को वामजनवादी विकल्प देने के लिए काम करने, व्यापक वामपंथी एकता के प्रयास तेज करने और गैरवामपंथी दलों से न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर रणनीतिगत समर्थन व सहयोग के रिश्ते बनाने आदि को भी।
फल यह है कि वामदलों में एका के बजाय बिखराव बढ़ता जा रहा है और कई कम्युनिस्ट पार्टियां अपने महासचिवों की जेबों में रहकर उनकी बौद्धिक भूख के शमन का जरिया भर रह गई हैं। दूसरी ओर कई वामपंथी पार्टियों के नेता उतने भी प्रतिबद्ध या ‘मेंटली इक्विप्ड’ नहीं रह गए हैं, जितने कभी उनके साधारण कार्यकर्ता हुआ करते थे।
उन्होंने आपस में एक दूजे के लिए बुर्जुआ, संशोधनवादी, सुधारवादी और संसदवादी आदि एक से बढ़कर एक गालियां विकसित कर डाली हैं और उन्हें लेकर अपने ही शिविर में ‘हत्याएं’ करते रहते हैं। वहां प्रतिबद्ध और अप्रतिबद्ध का झगड़ा भी ऐसा है कि प्राय: सारी वाम जमातें खुद को ही प्रतिबद्ध मानती हैं। क्या यह वैसे ही नहीं है आजकल कुछ जमातें हर किसी की देशभक्ति पर शक किया करती हैं?
ऐसे में वामदलों को पुनर्जीवन के लिए नये फार्मूलेशनों और रणनीतियों की बेहद सख्त जरूरत है, क्योंकि पुरानी कम्युनिस्ट थीसिसों का नए बदलावों के परिप्रक्ष्य में युगानुरूप परीक्षण किए बिना उनकी बात नहीं बनने वाली है और सवाल फिर वही कि क्या येचुरी इस लिहाज से कोई भूमिका निभा पएंगे? इसका एक जवाब यह भी है कि उनसे मध्यवर्गी पार्टियों के सुप्रीमो जैसी अपेक्षा नहीं ही की जानी चाहिए। सारे ‘पतन’ के बावजूद वामदलों का सांगठनिक ढांचा अभी भी अपने नायकों को, वह महासचिव ही क्यों न हो, निपट निरंकुश होने की इजाजत नहीं देता और जनवादी केंद्रीयता में यकीन करता है।
फिर किसे नहीं मालूम कि येचुरी की अपनी पार्टी तक में उनकी राजनीतिक लाइन के विरोधियों की कमी नहीं है। तिस पर बात इतनी सी ही नहीं है। जो दलित व पिछड़े कभी वामदलों के आधार हुआ करते थे, निराश होकर अब वे इस आरोप तक आ पहुंचे हैं कि वामपंथी दलों ने वर्ग के चक्कर में वर्ण की हकीकतों को ठीक से नहीं समझा है। ऐसे में आगे देखने की बात यही होगी कि येचुरी अपने तीसरे कार्यकाल में विगत दो कार्यकालों को ही दोहराते रह जाते हैं या कोई नई जमीन तोड़ पाते हैं।


