- बाराबंकी से आर्इं और मेरठ के दिल में बस गर्इं कांग्रेस की ‘ड्रीम गर्ल’
- लोग आते गए और कारवां जुड़ता गया, आज भी उनकी यादों में बसता है मेरठ
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: ‘मैं अकेला ही चला था जानिब ए मंजिल मगर लोग आते गए और कारवां जुड़ता गया’। एक जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में जन्मी एक लड़की इतनी जल्दी भारतीय राजनीति की ऊंचाइयों को छू लेगी किसी ने सोचा भी न था। खलील किदवई की हमराह और तीन बेटियों की हुनरमंद मां मोहसिना किदवई वैसे तो बाराबंकी के सिविल लाइन की रहने वाली हैं,
लेकिन उनका राजनीतिक ठिकाना लोधी एस्टेट नई दिल्ली है, हांलाकि अब वो नोएडा शिफ्ट हो रही हैं। उम्रदराज (92 साल) हो चलीं मोहसिना किदवई ने अपना ‘राजनीतिक यौवन’ जी भर के जिया। केन्द्र में कई विभागों की मंत्री रहीं और कांग्रेस की ‘ड्रीम गर्ल’ भी। मेरठ आज भी उनकी यादों में बसता है। आज भी यहां के लोगों से बेझिझक होकर मिलती हैं।
निराला था प्रचार का अंदाज
मोहसिना किदवई के चुनाव प्रचार में भागीदार बनने वाले वरिष्ठ कांग्रेसी डा. यूसुफ कुरैशी, आदित्य शर्मा और दीपक शर्मा बताते हैं कि मोहसिना किदवई जब मेरठ में अपना चुनाव प्रचार करती थीं तो उनका अंदाज निराला हुआ करता था। बताते हैं कि वो डोर-टू-डोर प्रचार में यकीन करती थीं ताकि प्रत्येक मतदाता से व्यक्तिगत रुप से मिल सकें। जब थक जातीं तो किसी भी पार्टी कार्यकर्ता अथवा मतदाता के घर कुछ पल आराम करतीं
और चाय की दो घूंट भी। इसके अलावा वो प्रचार के दौरान कभी कभी खुली जीप का इस्तेमाल भी कर लिया करती थीं। पैदल प्रचार के दौरान ‘सलाम और नमस्ते’ उनकी जुबां की रवानी हुुआ करते थे। हर किसी से हाथ मिलाना भी उनकी खासियतों में शुमार था। मोहसिना किदवई के साथ प्रचार की कमान थामने वाले स्थानीय कांग्रेसियों के अनुसार उनकी मीठी जुबां, कद्दावर शख्सियत और मकबूलियत (प्रसिद्धि) उनके लिए प्लस प्वॉइंट था।

धोती बांध कर करती थीं प्रचार, माथे पर होता था तिलक
मोहसिना किदवई हमेशा सेक्यूलर माइंड रहीं। उन्होंने कभी भी धर्म व जाति के आधार पर भेद नहीं किया। जब धोती बांधकर वो प्रचार करने निकलती, तब न जाने कितनी ही हिन्दु महिला मतदाता उनकी दीवानी हो जाती थीं। उनका धोती बांधकर प्रचार करना बेहद लोकप्रिय साबित होता था। इसी बीच बड़ी संख्या में हिन्दु महिलाओं में मोहसिना किदवई को टीका अथवा तिलक लगाने की होड़ सी रहती थी।
नानखताई से लेकर रेवड़ी गजक आज तक जाती है वहां
वैसे तो मोहसिना किदवई ने कभी भी किसी से कोई डिमांड नहीं की लेकिन जब भी मेरठ के यह वरिष्ठ कांग्रेसी उनसे मिलने दिल्ली जाते तो कभी नानखताई तो कभी रेवड़ी गजक उनके लिए जरुर लेकर जाते। मोहसिना किदवई आज भी इन कांगे्रसियों से मेरठ को लेकर चर्चा करती हैं।
कोकब हमीद और प्रद्युमन शर्मा की कोठी से चलती थीं गतिविधियां
मोहसिना किदवई ने मेरठ से 1980 और फिर 1984 के चुनावों में जीत हासिल की। इस दौरान उनकी चुनावी गतिविधियां कैंट स्थित नवाब कोकब हमीद और प्रद्युमन शर्मा की कोठियों से संचालित होती थीं। चुनाव जीतने के बाद जब भी वो मेरठ आती तो सर्किट हाउस में रुकतीं और यहीं पर पार्टी कार्यकर्ताओं से भेंट करतीं। उनकी एक खासियत और थी। वो कहती थीं कि यदि किसी भी कार्यकर्ता अथवा मेरठ के लोगों को कोईभी परेशानी हो तो वो इससे अवगत कराने के दिल्ली न आएं बल्कि वो खुद उनकी परेशानी सुनने मेरठ आएंगी और यही हुआ भी करता था।
राजनीतिक रिश्ता भले ही टूटा, निजी रिश्ते आज भी कायम
मोहसिना किदवई का मेरठ से राजनीतिक रिश्ता अब भले ही न हो, लेकिन उनके मेरठ और यहां की आवाम तथा स्थानीय कांग्रेसियों से निजि रिश्ते आज भी कायम हैं। आज भी मेरठ से डॉ. यूसुफ कुरैशी, डॉ. प्रेम प्रकाश शर्मा, सतीश शर्मा, कृष्ण कुमार शर्मा उर्फ किशनी, आदित्य शर्मा, विनोद शर्मा, मतन सिंह और अजय त्यागी जैसे पुराने कांग्रेसी बाकायदा उनसे मुलाकात करने अक्सर दिल्ली जाते रहते हैं।
ठेठ हिन्दु इलाकों से पड़ते थे 60 से 70 प्रतिशत वोट
जिस दौर में मोहसिना किदवई मेरठ से चुनाव लड़ती तब वोटों का धु्रवीकरण धार्मिक आधार पर न होकर मोहसिना किदवई के नाम पर होता था। जानकार बताते हैं कि स्वामीपाड़ा, पैड़ामल बजार, बीरु कुआं और ब्रह्मपुरी जैसे ठेठ हिन्दु बाहुल्य इलाकों तक से मोहसिना किदवई के पक्ष में 60 से 70 फीसदी वोट पड़ते थे।

